शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ ४९/५२*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*११. भगति संजीवनी कौ अंग ~ ४९/५२*
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प्रेम भगति सब कै सिरै, विद्या अरु गुरु ग्यांन ।
कहि जगजीवन निगम मत३, लोक लहै क्रित आंन ॥४९॥
(३. निगम मत=वैदिक मतों की अन्य साधनाएँ)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रेम भक्ति सबसे उपर है । भले ही विद्या हो या गुरु का ज्ञान । वैदिक क्रियाओं को जानने वाले उन में सार बताते हैं कि उन साधनाओं को करें ।
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प्रेम भगति कै सिरै, कोई जन पावै ताहि ।
कहि जगजीवन रांम भगति बिन, मिटै न चित की चाहि ॥५०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रेम भक्ति से ही जन प्रभु को पाते हैं संत कहते हैं कि राम भक्ति के बिना जीव की की चाहत कभी समाप्त नहीं होती ।
प्रेम भगति सब कै सिरै, नांव निरंजन नूर ।
कहि जगजीवन भगति मंहि, सकल मस्त भरपूर ॥५१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि प्रेम भक्ति सबके उपर है । और नाम का सौन्दर्य उसमें निहित है संत कहते हैं कि भक्ति में ये सब भरपूर रहता है ।
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ब्रह्म गती साबर मती, रांम रती ता मांहि ।
कहि गंगजल, हरिजल ये जल नांहि ॥५२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ दादू जी महाराज का जन्म हुआ उस गुजरात प्रदेश की मुख्य नदी साबरमती विशेष राम रुपी रंग से रंगी है । गंगा जल से भी भक्त इसे श्रेष्ठ मानते हुये कह रहैं कि जिसमें राम रंग है वह ही हरिजल है जो गंगाजल से भी श्रेष्ठ है ।
(क्रमशः)

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