शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

(“षष्टमोल्लास” ९१/९३)

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स्वामी माधवदास जी कृत श्री दादूदयालु जी महाराज का प्राकट्य लीला चरित्र ~
संपादक-प्रकाशक : गुरुवर्य महन्त महामण्डलेश्‍वर संत स्वामी क्षमाराम जी ~
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(“षष्टमोल्लास” ९१/९३)
*खाई अमल घूमे मतिवारा,*
*ऐसे भई सब राजकुंवारा ।* 
*अबै गुरुजी लार तुम्हारी,*
*वसन अभूषन द्यांह उतारी ॥९१॥* 
जिस प्रकार अमल खाने के पश्‍चात् व्यक्ति मतवाले पागल की तरह घूमता है वही स्थिति हम सब राजकुमारियों, राणियों की हो गई है । हे गुरुदेव अब ये राजसी वस्त्र आभूषण उतार कर हम आपके साथ ही रहना चाहती हैं ॥९१॥
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*श्री दादूजी ने सलेमपुर में ध्यान करने के लिये कहा*
*स्वामी कहै न, ल्यूं नहीं लारू,*
*रानी कहां रहै सो कहैं विचारू ।* 
*सलेमपुर आरणि अस्थांन,*
*कीजै जाई तहां गुरु ध्यांन ॥९२॥* 
स्वामी दादूजी ने कहा, मैं आपको अपने साथ नहीं रख सकता । तब राणी ने पूछा, फिर यह तो विचार कर कहो हम कहां रहे । तब दादूजी ने कहा सलेमपुर वन प्रांत के स्थान में रहकर विश्‍व गुरु परमात्मा का ध्यान करो ॥९२॥ 
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*अन्न पान कैसी विधि करिये,*
*इस्त्री जोनि जगत सो डरिये ।* 
*स्वामी उर महिं करो विचारू,*
*है कलियुग खोटी संसारू ॥९३॥* 
राणियों ने स्वामी जी से प्रार्थना की कि वहां हमारा खान पानादि का व्यवहार कैसे चलेगा । हमारा नारी शरीर हैं अत: जगत से डर भी लगता है । स्वामी जी आप ही अपने हृदय में विचार करो इस कलियुग के खोटे सांसारिक प्राणियों से हम कैसे निर्भय व सुरक्षित रह सकती हैं ॥९३॥ 
(क्रमशः)

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