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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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(#श्रीदादूवाणी ~ शूरातन का अंग २४ - ७६/७९)
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*सब जग छाड़ै हाथ तैं, तो तुम जनि छाड़हु राम ।*
*नहिं कुछ कारज जगत सौं, तुमहीं सेती काम ॥७६॥*
हे नाथ सब जगत् मुझे भले ही छोड़ दे, लेकिन आप मुझे कभी नहीं छोड़ना । क्योंकि जगत् से मुझे कोई कार्य नहीं हैं । किन्तु सारे काम आपके अधीन हैं ।
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*॥ सूरातन ॥*
*दादू जाते जीव तैं तो डरूं, जे जीव मेरा होइ ।*
*जिन यहु जीव उपाइया, सार करेगा सोइ ॥७७॥*
प्राणों के जाने का भी मुझे कोई भय नहीं है । क्योंकि प्राणों पर मेरा कोई अधिकार नहीं है । जिसने पैदा किया तथा जो इस का संचालन कर रहा है, उसी के प्राण हैं । वह ही इनकी रक्षा करेगा ।
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*दादू जिन को सांई पाधरा, तिन बंका नांही कोइ ।*
*सब जग रूठा क्या करै, राखणहारा सोइ ॥७८॥*
जिस भक्त पर भगवान् की कृपा हो गई उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता । सारे जगत् के रूठ जाने पर भी उसकी कोई हानि नहीं हो सकती क्योंकि उस की रक्षा करने वाला परमात्मा सब जगह पर विद्यमान है ।
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*दादू साचा साहिब शिर ऊपरै, तती न लागै बाव ।*
*चरण कमल की छाया रहै, किया बहुत पसाव ॥७९॥*
जिसके मस्तक पर सच्चा परमात्मा रक्षा करने वाला विद्यमान् है उसको अग्नि नहीं जला सकती वायु उस को छू भी नहीं सकता । अन्य की तो बात की क्या है ? जो भगवान् की चरण छाया में विराजता है । उस पर भगवान् की महती अनुकम्पा है । क्योंकि वह उनकी कृपा का पात्र है ।
(क्रमशः)

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