मंगलवार, 30 मार्च 2021

*संसारी लोगों के लिए विषय-कर्मत्याग कठिन है*

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*दादू माया मगन जु हो रहे, हमसे जीव अपार ।*
*माया माहीं ले रही, डूबे काली धार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ माया का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*संसारी लोगों के लिए विषय-कर्मत्याग कठिन है*
प्राणकृष्ण – (श्रीरामकृष्ण से) – महाराज, अब सोच रहा हूँ, काम छोड़ दूँगा । काम करने लगा, तो फिर और कुछ नहीं होगा । इन्हें(साथ के एक बाबू की ओर इशारा करके) काम सिखा रहा हूँ । मेरे छोड़ देने पर ये काम करेंगे, अब और नहीं होता ।
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श्रीरामकृष्ण – हाँ, बड़ी झंझट है । इस समय कुछ दिन निर्जन में ईश्वर-चिन्तन करना बहुत अच्छा है । तुम कहते तो हो कि छोड़ोगे । कप्तान ने भी यही बात कही थी । संसारी आदमी कहते तो हैं, पर कर नहीं सकते ।
“कितने ही पण्डित हैं जो ज्ञान की बातें कहा करते हैं । वे मुख ही से कहते हैं, काम कुछ नहीं कर सकते । जैसे गिद्ध उड़ता तो बहुत ऊँचे है, परन्तु उसकी नजर मरघट पर ही रहती है । अर्थात् उसी कामिनी-कांचन पर – संसार पर आसक्ति । अगर मैं सुनता हूँ कि किसी पण्डित को विवेक-वैराग्य है तो मुझे सचमुच उनसे श्रद्धापूर्ण भय होता है और नहीं तो वे सब भेड-बकरे-से ही जान पड़ते हैं ।”
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प्राणकृष्ण प्रणाम करके बिदा हुए । उन्होंने मास्टर से चलने के लिए पूछा । मास्टर ने कहा; मैं अभी न जाऊँगा, आप चलिये । प्राणकृष्ण ने हँसते हुए कहा, तुम अब और नाव पर कदम रखोगे ? (सब हँसते हैं ।)
मास्टर ने पंचवटी में थोड़ी देर टहलकर, जिस घाट में श्रीरामकृष्ण नहाते थे, उसी में नहाया । इसके बाद श्रीभवतारिणी और राधाकान्त के दर्शन किये । वे सोच रहे हैं, मैंने सुना था ईश्वर निराकार हैं, तो फिर क्यों मैं इस मूर्ति के सामने प्रणाम कर रहा हूँ ? क्या श्रीरामकृष्ण साकार देव- देवियों को मानते हैं इसलिए ? मैं तो ईश्वर के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं समझता; परन्तु जब कि श्रीरामकृष्ण मानते हैं, तो मैं किस खेत की मूली हूँ – मानना ही होगा ।
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मास्टर श्रीभवतारिणी माता के दर्शन कर रहे हैं । देखा, उनके दोनों बायें हाथों में खड्ग और नरमुण्ड शोभा दे रहे हैं, दोनों दाहिने हाथों में वर और अभय । एक ओर वे भयंकरा मूर्ति हैं और दूसरी ओर भक्तवत्सलता मातृमूर्ति । उनमें दो भावों का एकत्र समावेश हो रहा है । भक्तों के निकट, अपने दीन-हीन जीवों के निकट, माता दयामयी और स्नेहमयी के स्वरूप में आती हैं और यह भी सत्य है कि वे भयंकरा और कालकामिनी भी हैं । एक ही आधार में ये दो भाव क्यों हैं, इसका हाल तो वे ही जाने ।
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मास्टर श्रीरामकृष्ण की व्याख्या याद कर रहे हैं । सोच रहे हैं – सुना है, केशव सेन ने भी श्रीरामकृष्ण के पास देवी-प्रतिमा का अस्तित्व स्वीकार कर लिया था । ‘क्या यही मृण्मय आधार में चिन्मयी मूर्ति हैं ?’ केशव यही बात कहते थे ।
अब वे श्रीरामकृष्ण के पास आकर बैठे । वे नहा चुके हैं, यह देखकर श्रीरामकृष्ण ने उन्हें फलमूल प्रसाद खाने के लिए दिया । गोल बरामदे में आकर उन्होंने प्रसाद पाया । पानीवाला लोटा बरामदे में ही रह गया था । वे जल्दी से श्रीरामकृष्ण के पास आकर कमरे में बैठ ही रहे थे कि श्रीरामकृष्णने कहा, तुम लोटा नहीं लाये ?
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मास्टर – जी हाँ, लाता हूँ ।
श्रीरामकृष्ण – वाह !
मास्टर का चेहरा फीका पड़ गया । बरामदे से लोटा लाकर कमरे में रखा ।
मास्टर का घर कलकत्ते में है । घर में शान्ति न मिलने के कारण उन्होंने श्यामपुकुर में किराये का मकान लिया है । उनका स्कूल भी वहीँ है । उनके अपने मकान में उनके पिता और भाई रहते हैं । श्रीरामकृष्ण की इच्छा है कि वे अपने मकान में आकर रहें; क्योंकि एक ही घर और एक ही थाली के खानेवालों में भजन-पूजन करने की बड़ी सुविधा है । यद्यपि श्रीरामकृष्ण बीच-बीच में ऐसा कहते थे, तथापि दुर्भाग्यवश मास्टर अपने घर वापस नहीं जा सके । आज श्रीरामकृष्ण ने फिर यही बात उठायी ।
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श्रीरामकृष्ण - क्यों, अब तुम घर जाओगे ?
मास्टर – मेरा तो वहाँ रहने के लिए किसी तरह जी नहीं चाहता ।
श्रीरामकृष्ण – क्यों, तुम्हारा बाप मकान गिरवाकर वहाँ नयी ईमारत खड़ी कर रहा है ।
मास्टर – घर में मुझे बड़ी तकलीफ मिली है । वहाँ जाने को मेरा किसी तरह मन नहीं होता ।
श्रीरामकृष्ण – तुम किससे डरते हो ?
मास्टर – सब से ।
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श्रीरामकृष्ण – (गम्भीर स्वर में) – वह भय वैसा ही है जैसा तुम्हें नाव पर चढ़ते समय होता है ।
देवताओं का भोग लग गया । आरती हो रही है । कालीमन्दिर में आनन्द हो रहा है । आरती का शब्द सुनकर, कंगाल, साधु, फकीर, सब अतिथि-शाला में दौड़े आ रहे हैं । किसी के हाथ में पत्तल है, किसी के हाथ में थाली लोटा । सब ने प्रसाद पाया । आज मास्टर ने भी भवतारिणी का प्रसाद पाया ।
(क्रमशः)

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