मंगलवार, 30 मार्च 2021

*वाणी विचार का अंग १४६(१/४)*

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*जहँ तन मन का मूल है, उपजे ओंकार ।*
*अनहद सेझा शब्द का, आतम करै विचार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वाणी विचार का अंग १४६*
इस अंग में वाणी संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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रज्जब प्राकृत ओंकार है, प्राकृत ही रटि राम ।
प्राकृत ही टीका भया, संस्कृत के शिर ठाम ॥१॥
जिसका संस्कार करके संस्कृत बनाई गई उस प्राकृत वाणी का ही ओंकार है जिसका जप किया जाता है, वह राम मंत्र भी प्राकृत का ही है और संस्कृत के शिर स्थान पर टीका भी साधारण बोलचाल की प्राकृत भाषा में ही किया जाता है अत: भाषा विशेष महत्व रखती है ।
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आदि जु प्राकृत मूल है, अंत सु प्राकृत पान१ ।
रज्जब बिच वृक्ष संस्कृत, फ३लार्थ४ कौने२ थान ॥२॥
पहले वृक्ष की जड़ है, बीच में वृक्ष है और अंत में पत्ते१ होते हैं, अब कहो फल३ किस२ स्थान पर मिलता है ? पत्तों के पास ही तो मिलता है । वैसे ही आदि में प्राकृत भाषा थी, बीच में प्राकृत का संस्कार करके संस्कृत बनी, अन्त में फिर बोलचाल की भाषा हो गई और संस्कृत का अर्थ४ भी बोलचाल की प्राकृत भाषा से ही प्राप्त होता है । अत: प्राकृत अधिक उपयोगी है ।
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प्राकृत मध्य ही ऊपजे, संस्कृत सब ही वेद ।
अब समझावै कौन करि, पाया भाषा भेद१ ॥३॥
प्राकृत भाषा में से ही संस्कृत और सब वेद उत्पन्न होते हैं । अब उन वेदों और संस्कृत को किससे समझाया जाता है ? बोलचाल की प्राकृत भाषा से ही समझाया जाता है । इस प्रकार हमने भाषा का रहस्य१ जान लिया है कि - प्राकृत भाषा ही सर्वोपयोगी है ।
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प्राकृत पृथ्वी पवन है, संस्कृत है घट श्वास ।
एक१ सजीवन एक२ मिल, एक३ एक४ बिन नाश ॥४॥
प्राकृत भाषा तो पृथ्वी की वायु के समान है और संस्कृत शरीर के श्वास के समान है । जैसे शरीर का श्वास१ पृथ्वी२ के वायु से मिलकर जीवित रहता है शरीर का प्राण३ बाहर पृथ्वी के वायु४ बिना नष्ट हो जाता है अर्थात शरीर में नहीं रहता । वैसे ही प्राकृत२ से मिलकर ही संस्कृत१ जीवित है, प्राकृत बिना संस्कृत४ नष्ट प्राय: है अर्थात समझ में नहीं आती ।
(क्रमशः)

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