सोमवार, 29 मार्च 2021

*शब्द का अंग १४५(४०/४२)*

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*दादू शब्द बाण गुरु साध के, दूर दिसन्तरि जाइ ।*
*जिहि लागे सो ऊबरे, सूते लिये जगाइ ॥*
(श्री दादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*शब्द का अंग १४५*
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वायु अकेली वन हलै, देख हु विश्वाबीस१ ।
सो समीर२ सँग शब्द के, तो क्यों न डुलावै३ शीश ॥४०॥
देखो, अकेले वायु से सम्पूर्ण१ वन हिल जाता है, फिर वह वायु२ शब्द के संग हो तब क्यों नहीं आश्चर्य आदि से श्रोता का मस्तक हिलेगा३, विचित्र अर्थ वाले शब्द सुनने से प्राय: मस्तक हिल ही जाता है ।
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सुई शब्द पशु प्राणी खाये, दिन दिन होत व्यथा रे ।
देखो चरते पीवते, रज्जब रोग सु मारे ॥४१॥
यदि कोई पशु सुई खा जाता है तो प्रतिदिन उसके शरीर में व्यथा होती रहती है, वह घास चरते तथा जल पीते हुये उस रोग से मारा जाता है वैसे ही जिस प्राणी के शब्द चुभ जाता है, उसकी व्यथा प्रति दिन बढती जाती है और वह खाते पीते हुये भी उस रोग से मर जाता है । सांसारिक शब्द हो तो मारा जाता है परमार्थिक हो तो जीवन्मुक्त हो जाता है ।
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रज्जब बनसी१ बैनकी, मीन मनिष२ जो खांहि ।
देखो वारि विभूति३ में, सो ठहरावे नाँहिं ॥४२॥
यदि मच्छी पकड़ने के कांटे१ को मच्छी निगल जाती है तो वह जल में नहीं ठहर सकती, वैसे ही देखो, जो मनुष्य२ संतों के शब्द ग्रहण करता है, वह मायिक३ प्रपंच में नहीं रह सकता ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित शब्द का अंग १४५ समाप्तः ॥सा. ४५३८॥
(क्रमशः)

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