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*दादू यह तो दोज़ख देखिये, काम क्रोध अहंकार ।*
*रात दिवस जरबौ करै, आपा अग्नि विकार ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु ---मात पिता की भक्ति
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कौशिक नामक एक ब्राह्मण वेदपाठ करता था । एक बगुली ने उस पर बींठ कर दी । ब्राह्मण ने क्रूर दृष्टि से ऊपर देखा, बगुली पर दृष्टि पड़ते ही वह भस्म होकर नीचे गिर पड़ी, इस कुकृत्य पर पश्चाताप करता हुआ वह भिक्षा के निमित एक पतिव्रता के घर गया और भिक्षा मांगी किन्तु पतिव्रता पति सेवा में लगी थी । देर होने से ब्राह्मण को क्रोध आ गया ।
पतिव्रता ने कहा - "बाबा क्रोध क्यों करते हो यहाँ कोई वन की बगुली तो नहीं है जो भस्म हो जायेगी । अभी तुम्हें धर्म का यथार्थ ज्ञान नहीं है यदि तुम परम धर्म जानना चाहते हो तो मिथिलापुर के माता पिता के भक्त व्याध के पास जाओ ।" कौशिक और धर्म व्याध में जो ज्ञान चर्चा हुयी थी महाभारत वन पर्व में धर्म व्याध गीता के नाम से प्रसिद्ध है ।
कौशिक ने पूछा - "यह उत्तम ज्ञान आपको किस साधन से मिला ?" धर्मव्याध - "माता पिता की सेवा से" यह कहकर कहा - "तुम भी माता पिता की सेवा करो ।"
मातु पिता की भक्ति से, होता आतम ज्ञान ।
महाभारत में प्रकट है, धर्म व्याध आख्यान ॥३४॥

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