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*निराकार सौं मिल रहै, अखंड भक्ति कर लेह ।*
*दादू क्यों कर पाइये, उन चरणों की खेह ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*समुदाई की पद्य टीका*
इन्दव –
*इन्द्र अगन्नि गये सत देखन,*
*देत शिवी तन काट सु मांसं ।*
*सुर्थ सुधन्वहिं दोष दियो द्विज,*
*शंख लिखित्त भयी वपु त्रासं ॥*
*देह दधीच दिई सुरपत्ति हिं;*
*भर्त सु भागवंत हि प्रकासं ।*
*भक्त सुदर्शन है इतिहास ही,*
*दत्त तिया जन और न दासं ॥७३॥*
राजा शिवि की कथा छप्पय ५५ की टीका में देखें । सुरथ और सुधन्वा की कथा छप्पय ५४ की टीका में देखें । दधीचि की कथा छप्पय १०१ की टीका में देखें भरतजी की कथा जो श्री मद्भागवत में प्रकट की गई है सो कथा ५९ वें मनहर छंद की टीका में देखें । भक्त सुदर्शन अग्निदेव के पुत्र हैं । इनकी माता इक्ष्वाकुवंशीय दुर्योधन की पुत्री सुदर्शना थी । महाराज ओघवान् की पुत्री ओघवती इनकी धर्मपत्नी थी । अतिथि सत्कार के द्वारा मृत्यु आदि पर जय प्राप्त करने की इनकी प्रतिज्ञा थी । इनने अपनी पत्नी के अतिथि भेषधारी धर्मराज की सेवा में जाने पर हर्ष प्रकट किया था । यही ‘देततिया’ से पद्य में सूचित की है । इनके समान भक्त और नहीं दिखाई देता है । इनकी विशेष कथा छप्पय ९१ की टीका में देखें ।
(क्रमशः)

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