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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१५. माया कौ अंग ~ ४१/४४*
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सब संपति ए जायगी, विपति पडैगी आइ ।
जगजीवन सोई भला, जे कोई खरचै खाइ ॥४१॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह सब सम्पत्ति नष्ट होने वाली है और विपत्ति भी धनाभाव से आयेगी अतः जीवन में कुछ खर्च दानादि में करें व कुछ सेवा में लगाये स्वयं भी खायें और अभ्यागतों को भी खिलाने में खर्च करें ।
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जगजीवन संपति जहां, तहां विपति पुनि होइ ।
फूलत है जे आदमी, कुमलावेगा१० सोइ ॥४२॥
(१०. कुमलावेगा=मुरझा जायगा)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जहां सम्पत्ति है वहाँ विपत्ति भी होगी यह ही प्रकृति का नियम है कि जो फूलेगा वह कुम्हलायेगा भी अवश्य ।
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पुरुष भया अंग बाहिरा, लाइ तणीं झल दाझि११ ।
कहि जगजीवन रांम तजि, अनंत रह्या जे बाझि१२ ॥४३॥
(११. लाइ तणी झल दाझि=प्रज्वलित अग्नि से उत्पन्न लपटों से जलना) (१२. बाझि=बंधा रह गया)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जीव अंतर स्थित प्रभु से परे रहता है वह संसारिक दुखों की अग्नि में जलता है । वह प्रभु विमुख हो इस प्रकार की ससांर जलता है जैसे वह बंधा हो जो आग से बचने के लिये भाग भी न सकता हो यह बंधन मोह आदि के है जो दुख का कारण बनते हैं ।
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जगजीवन धन धान की, सब जीवन कै चाहि ।
जा थैं आनंद ऊपजै, कोई बिरला चीन्है ताहि ॥४४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हर जीव धन धान्य चाहता है और जो आनंद का कारक है उन प्रभु को कोइ विरला जन ही पहचानता है ।
(क्रमशः)

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