बुधवार, 31 मार्च 2021

विनती कौ अंग ३४ - १९/२२

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज,व्याकरण वेदांताचार्य श्रीदादू द्वारा बगड़,झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज,बगड़ झुंझुनूं । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी ~ विनती कौ अंग ३४ - १९/२२)*
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*माया विषय विकार तैं, मेरा मन भागे ।*
*सोई कीजे साँईयाँ, तूँ मीठा लागे ॥१९॥*
हे राम ! आपकी कृपा से मेरा मन मायादिजन्य अनेक विषयविकारों को त्याग कर भाग जाय और आप ही मुझे प्रिय लगे और आपका दर्शन करूं, ऐसे नेत्र प्रदान करें ।
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*साँई दीजे सो रति, तूँ मीठा लागे ।*
*दूजा खारा होइ सब, सूता जीव जागे ॥२०॥*
हे प्रभो ! आप अपनी प्रेमाभक्ति दीजिये । जिससे मुझे आप ही प्रिय लगने लगें और यह सारा जगत् वस्तुतः ही खारा लगे और अविद्या में सोया हुआ जीव जाग जाय । यह सब कार्य जब आपकी दया मेरे पर होगी तब ही संभव है ।
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*ज्यों आपै देखे आपको, सो नैना दे मुझ ।*
*मीरां मेरा मेहर कर, दादू देखे तुझ ॥२१॥*
हे प्रभो ! आप महान् दयालु कहलाते हैं । अतः आप मेरे पर ऐसी कृपा करो जिससे मुझे ज्ञान नेत्र प्राप्त हो जायँ और मैं उस ज्ञान नेत्र से सर्वत्र आत्मा को ही देखो सकूं ।
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*॥ करुणा ॥*
*दादू पछतावा रह्या, सके न ठाहर लाइ ।
*अर्थ न आया राम के, यहु तन योंही जाइ ॥२२॥*
दादू के चित्त में सदा ही अनुताप रहता है की जगदीश्वर राम के लिये मैं कुछ कार्य नहीं कर सका । अर्थात् इसकी भक्ति, मैं नहीं कर सका और यह मेरा शरीर राम के काम में नहीं आने से व्यर्थ ही चला गया ॥२२॥
(क्रमशः)

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