बुधवार, 31 मार्च 2021

*१५. माया कौ अंग ~ ४५/४८*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१५. माया कौ अंग ~ ४५/४८*
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जे आया इस घाण१ में, कहा अजांण कहा जांण ।
जगजीवन सोई थक्या, राव रंक कहा रांण ॥४५॥
{१. घाण=घान(उतना अन्न, जितना पीसने के लिये चक्की में डाला जाय)}
संतजगजीवन जी कहते हैं यह जग एक चक्की है जो इसके अन्दर आ गया उसकी स्थिति चक्की में पड़े धान जैसी होती है उसे तो पिसना ही पड़ता है । चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी और फिर वह चाहे राजा हो या गरीब हो ।
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माया मांहैं खेलतां, मन क्यूं निहचल होइ ।
जगजीवन चंचल चपल, नित उठि नाचै सोइ ॥४६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि माया मे मगन रह कर मन स्थिर नहीं होता यह चंचल है नित्य ही संसार की ओर आकर्षित हो नाचता है ।
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जांणै तो काहे मरै, बिन जांणै मर जाइ ।
रस मांहै बेरस२ करै, जगजीवन विष खाइ ॥४७॥
(२. बेरस=स्वादरहित)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव ज्ञानी हो तो जीवन व्यर्थ क्यों खोये यह बिना जाने ही खो देता है । वह आनंद में विषाद कर विषमय होता है ।
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बे तो साजन बीसरी३, जिनका ए सब सूल४ ।
भोलै भूली नाहकै५, जगजीवन इंहि भूल ॥४८॥
{३. बीसरी=विस्मृत हो गयी} {४. सूल=उसूल(कठोर नियम)}
{५. नाहकै=नाहक(व्यर्थ)}
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे आत्मा तू प्रियतम परमेश्वर को ही भूल गयी । अपनी अज्ञान अवस्था में तू ने ऐसा किया और यह ही सबसे बड़ी भूल सिद्ध हुई है ।
(क्रमशः)

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