बुधवार, 31 मार्च 2021

*रुक्मांगद की पद्य टीका*

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*ज्यों रचिया त्यों होइगा, काहे को सिर लेह ।*
*साहिब ऊपरि राखिये, देख तमाशा येह ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*रुक्मांगद की पद्य टीका*
*बाग पहोपन१ छाय रह्यो शुभ,*
*देव तिया वह लेन हि आँहीं ।*
*बैंगन कंटक पाँव लग्यो इक,*
*बैठ रही सुन के नृप जाँहीं ॥*
*बात कहो स्वर्ग लोक पठावत,*
*ग्यारस वास दिये सुख पाहीं ।*
*ग्राम न जानत होत कहा व्रत,*
*काल्हि रही इक ठीक बिना हीं ॥७४॥*
राजा रुक्मांगद – इक्ष्वाकुवंशीय अयोध्या नरेश ऋतुध्वज के पुत्र थे । ये धर्मात्मा और भगवान् नारायण के भक्त थे । इनकी पत्नी सन्ध्यावली से एक सुशील पितृभक्त पुत्र हुआ था उसका नाम धर्मांगद था । महाराज रुक्मांगद का बाग विविध प्रकार के सुन्दर पुष्पों२ से भरा रहता था । देवताओं की नारियाँ भी उन पुष्पों को लेने आती थीं । एक अप्सरा पुष्प लेने इस बाग में उतरी थी । उसके पैर में एक बैंगन का कांटा लग गया था । इससे पुण्य क्षीण हो जाने से वह वहाँ ही बैठ गयी । राजा रुक्मांगद ने सुना तब वे उसके पास आये और...
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बोले – आप वह बात हमें बताइये जिससे आप पुनः स्वर्ग में जा सकें । जो उपाय बतायें वह हम करने का यत्न करेंगे । उसने कहा – एकादशी व्रत का फल मुझे दें तो मैं पुनः स्वर्ग में जाकर सुख प्राप्त कर सकती हूँ । राजा ने ग्राम की जनता से यह माँग की किन्तु ग्राम के जानते ही नहीं थे कि व्रत क्या होता है । बिना जाने ही एक बनियाँ की दासी गत दिन भूखी रह गई थी ।
(क्रमशः)

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