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*साधु बरसैं राम रस, अमृत वाणी आइ ।*
*दादू दर्शन देखतां, त्रिविध ताप तन जाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*वाणी विचार का अंग १४६*
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रज्जब वपु वाणी विधि एक है, जीव जगत गुरु नाम ।
सदा सजीवन लीजिये, तजिये मृतक सु ठाम१ ॥१७॥
शरीर और वाणी की विधि एक ही है अर्थात जैसी वाणी नाना है, वैसे ही शरीर भी नाना है जगत में उनके नाम भी, जीव, गुरु आदि प्रसिद्ध है । उनमें जो ज्ञान रूप जीवन से युक्त हो उसे ही अपना कर उसकी वाणी धरण करो और मृतक तुल्य अज्ञानी का देह रूप धाम१ छोड़ो अर्थात उसका संग न करो ।
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वैद्यक१ ज्योतिष जैन मत, मंत्र सु माला नाँउ२ ।
व्याह३ कारटों४ संस्कृत, तातैं मैं न पत्यांउ५ ॥१८॥
आयुर्वेद१, ज्योतिष, जैन मत, मंत्र तंत्रों की माला आदि जिनके नाम२ हैं, यह संस्कृत के भेद सब विवाह३ के समय काकों४ के समान है । इसलिये मैं इन पर अपने उद्धार का विश्वास५ नहीं करता । भाव यह है - जैसे विवाह होते समय काक पक्षी का आदर नहीं किया जाता, वैसे ही मुक्ति का इच्छुक उक्त सबका आदर नहीं करता ।
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संसकृत सांई विमुख, भाषा भगवत भाय१ ।
सोने के जल सौं लिखी, गाली विविध बनाय ॥१९॥
प्रभु यश से रहित संस्कृत ऐसी है, जैसे नाना प्रकार की गालियाँ बना कर सोने के जल से लिखी हों, वह सुन्दर दिखने पर भी प्रिय नहीं लगती किंतु भगवान के भाव१ से युक्त साधारण भाषा भी संतों को प्रिय होती है ।
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सगुण रु निर्गुण ठौर की, वाणी बीच दलाल ।
रज्जब गाहक जीव के, खैंचे द्वै दिशि चाल ॥२०॥
सगुण और निर्गुण दोनों स्वरूपों की प्राप्ति के लिये वाणी ही बीच में दलाल है, दोनों पक्ष वाले जीव के ग्राहक हैं और दोनों प्रकार की चाल से जी को वाणी द्वारा अपनी अपनी ओर खेंचते हैं ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित वाणी विचार का अंग १४६ समाप्तः ॥सा. ४५५८॥
(क्रमशः)

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