शनिवार, 3 अप्रैल 2021

*एक न एक झंझट पैदा होती है*

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*दादू औगुण गुण कर माने गुरु के,*
*सोई शिष्य सुजाण ।*
*सतगुरु औगुण क्यों करै, समझै सोई सयाण ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ गुरुदेव का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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राम की घर-गृहस्थी की बहुत सी बातें हो रही हैं । राम के पिता परम वैष्णव हैं । घर में श्रीधर की सेवा होती है । राम के पिता ने अपना दूसरा विवाह किया था उस समय राम की उम्र बहुत कम थी । पिता और विमाता राम के घर में ही थे, परन्तु विमाता के साथ रहकर राम सुखी नहीं रह सके । इस समय विमाता की उम्र बहुत कम थी । विमाता के कारण राम और उनके पिता में कभीकभी अनबन हो जाती थी । आज वे ही सब बातें हो रही हैं ।
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राम – बाबूजी की बुद्धि मारी गयी है ।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – सुना ? बाबूजी की बुद्धि मारी गयी है और आपकी बहुत अच्छी है ।
राम – उनके(विमाता के) मकान में आने ही से अशान्ति होती है । एक न एक झंझट पैदा होती है । हमारा परिवार नष्ट होने पर आ गया । इसीलिए मैं कहता हूँ, वे अपने मायके में क्यों नहीं रहतीं ? (सब हँसते है ।)
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गिरीन्द्र – (राम से) – अपनी स्त्री को उसी तरह मायके में क्यों नहीं रखते ? (सब हँसते हैं ।)
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – यह क्या कुछ हण्डी और घड़ा है ? हण्डी एक जगह रही और उसका ढक्कन दूसरी जगह ! शिव एक ओर तथा शक्ति दूसरी ओर !
राम – महाराज, हम लोग सुख से हैं, वे आयी नहीं कि तोड़फोड़ मचाया । ऐसी दशा में –
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श्रीरामकृष्ण – हाँ, अलग एक मकान कर दो, यह एक बात हो सकती है । महीने-महीने सब खर्च देते जाना । पिता कितने बड़े गुरु हैं । राखाल मुझसे पूछता था, क्या मैं बाबूजी की थाली में खा लूँ ? मैंने कहा, अरे, यह क्या ? तुझे हो क्या गया है जो तू अपने बाप की थाली में न खायेगा ?’
“परन्तु एक बात है । जो लोग सन्मार्ग में हैं, वे अपना जूठा किसी को खाने के लिए नहीं देते । यहाँ तक कि कुत्ते को भी जूठन नहीं दी जाती ।”
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गिरीन्द्र – महाराज, माँ-बाप ने अगर कोई घोर अपराध किया हो, कोई घोर पाप किया हो तो ?
श्रीरामकृष्ण - तो वह भी सही । माता यदि व्याभिचारिणी हो तो भी उसका त्याग न करना चाहिए । अमुक बाबुओं की गुरुपत्नी का चरित्र नष्ट हो गया । तब उन्होंने कहा, उनका लड़का गुरु बनाया जाय । मैंने कहा, ‘यह तुम क्या कहते हो ? तुम सूरन को छोड़कर सूरन की आँख लोगे ? नष्ट हो गयी तो क्या हुआ ? तुम उसे ही अपना इष्ट समझो ।’ एक गान में है – ‘मेरे गुरु यद्यपि कलवार की दूकान पर जाया करते हैं, तथापि मेरे गुरु नित्यानन्द राय हैं ।’
(क्रमशः)

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