रविवार, 4 अप्रैल 2021

विनती कौ अंग ३४ - ३६/३९

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज,व्याकरण वेदांताचार्य श्रीदादू द्वारा बगड़,झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज,बगड़ झुंझुनूं । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी ~ विनती कौ अंग ३४ - ३६/३९)*
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*आगे पीछे संग रहै, आप उठाये भार ।*
*साधु दुखी तब हरि दुखी, ऐसा सिरजनहार ॥३६॥*
भगवान् भक्तों के आगे पीछे पास में सदा रक्षा करने के लिये सन्नद्ध रहते हैं और उनके योगक्षेम का सारा भार भगवान् स्वयं ही वहन करते हैं । भक्तों के दुःखी होने पर भगवान् भी उनके दुःख से द्रवीभूत हो जाते हैं ॥३६॥
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*सेवक की रक्षा करै, सेवक की प्रतिपाल ।*
*सेवग की वाहर चढै, दादू दीन दयाल ॥३७॥*
भगवान् अपने भक्तों की काम क्रोध आदि दोषों से सदा रक्षा करते रहते हैं और अन्न जलादि के द्वारा उनका पालन पोषण वे ही करते रहते हैं । अतः संकट काल में आप मेरी सहायता कीजिये । क्योंकि आप दीनों पर दया करने वाले दया के सागर हैं ॥३७॥
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*॥ विनती सागर तरण ॥*
*दादू काया नाव समंद में, औघट बूड़े आइ ।*
*इहि अवसर एक अगाध बिन, दादू कौन सहाइ ॥३८॥*
यह सूक्ष्म शरीर रूपी नौका इस संसार समुद्र में विषय वासना रूपी दुस्तर स्थल में आकर डूब रही है । इस महान् विपत्ति काल में प्रभु को छोडकर कौन दूसरा सहायता करके रक्षा करने वाला है अर्थात् कोई नहीं ॥३८॥
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*यहु तन भेरा भौजला, क्यों कर लंघे तीर ।*
*खेवट बिन कैसे तिरै, दादू गहर गंभीर ॥३९॥*
यह हमारा सूक्ष्म शरीर संसार समुद्र के विषय वासना रूपी अत्यन्त घने और गंभीर जल में डूब रहा है । बिना नाविक के कैसे स्वतः तैरकर किनारे लगेगी? परमात्मा ही यदि केवट बन जाय तो उसकी दया से पार हो सकती है । अन्यथा नहीं ॥३९॥
(क्रमशः)

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