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*साच न सूझै जब लगै, तब लग लोचन अंध ।*
*दादू मुक्ता छाड़ कर, गल में घाल्या फंद ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*चैतन्यदेव और माँ । मनुष्य के ऋण*
“माँ-बाप क्या कुछ साधारण मनुष्य हैं ? बिना उनके प्रसन्न हुए धर्म-कर्म कुछ भी नहीं होता । चैतन्यदेव प्रेम से पागल थे, परन्तु फिर भी संन्यास से पहले कुछ दिन लगातार उन्होंने अपने माता को समझाया था । कहा था – माँ ! मैं कभी कभी आकर तुम्हें देख-दिखा जाया करूँगा ।’
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(मास्टर से तिरस्कार करते हुए) और तुम्हारे लिए कहता हूँ, माँ-बाप ने तुम्हें आदमी बना दिया, अब कई लड़के-बच्चे भी हो गये हैं, इस पर बीबी को साथ लेकर निकल आना ! माता-पिता को धोखा देकर बीबी-बच्चे को लेकर, वैष्णव-वैष्णवी बनकर निकलता है ! तुम्हारे बाप को कोई कमी नहीं है, नहीं तो मैं कहता, धिक्कार है तुमको ! (सब के सब स्तब्ध हैं ।)
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“कुछ ऋण हैं । देवऋण, ऋषिऋण; उधर मातृऋण, पितृऋण, स्त्री-ऋण । माता-पिता के ऋण का शोध किये बिना कोई काम नहीं होता । फिर पत्नी का भी ऋण है । हरीश पत्नी का त्याग करके यहाँ आकर रहता है । यदि उसकी स्त्री के भोजन की सुविधा न होती तो मैं कहता, साला बेईमान है । “ज्ञान के पश्चात उसी पत्नी को तुम साक्षात् भगवती देखोगे !
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सप्तशती में है, ‘या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।’ वे ही माँ हुई हैं ।
“जितनी स्त्रियाँ देखते हो, सब वे ही हैं; इसीलिए मैं वृन्दा(नौकरानी) को कुछ कह नहीं सकता । कोई-कोई लोग श्लोक झाड़ते हैं – लम्बी-लम्बी बातें बघारते हैं, परन्तु उनका व्यवहार कुछ और ही होता है । इस हठयोगी के लिए किसी तरह अफीम और दूध इकट्ठा हो, रामप्रसन्न बस इसी चिन्ता में मारामारा घूमता है ।
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और वह यह भी कहता है कि मनु में साधु-सेवा का उल्लेख है । इधर बूढ़ी माँ खाने को नहीं पाती, सौदा खरीदने के लिए हाट-बाजार खुद जाया करती है । क्या कहूँ ऐसा क्रोध आता है ! “परन्तु एक बात और है । अगर प्रेमोन्मत्त अवस्था हो तो फिर कौन है बाप, कौन है माँ और कौन है स्त्री ? ईश्वर पर इतना प्यार हो कि पागल हो जाय ।
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फिर उसके लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं रह जाता । सब ऋणों से वह मुक्त हो जाता है । प्रेमोन्माद कैसा है, जानते हो ? उस अवस्था के आने पर संसार भूल जाता है । अपनी देह जो इतनी प्यारी चीज है, वह भी भूल जाता है । यह अवस्था चैतन्यदेव की हुई थी । समुद्र में कूद पड़े, समुद्र का बोध ही नहीं । मिट्टी में बार-बार पछाड़ खा-खाकर गिरते हैं, न भूख है, न नींद; शरीर का बोध भी नहीं है !”
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श्रीरामकृष्ण ‘हा चैतन्य’ कह उठे ।
(भक्तों के प्रति) “चैतन्य के गाने अखण्ड चैतन्य । वैष्णवचरण कहता था, गौरांग अखण्ड चैतन्य की ही एक छटा हैं । “तुम्हारी क्या इस समय तीर्थ जाने की इच्छा है ?”
बूढ़े गोपाल – जी हाँ, जरा देखभाल आयें ।
राम – (बूढ़े गोपाल से) – ये कहते हैं, बहूदक के बाद कुटीचक की अवस्था होती है । जो साधु अनेक तीर्थों का भ्रमण करते हैं, उनका नाम है बहूदक, और जो एक जगह डटकर आसन जमा देते हैं उन्हें कुटीचक कहते हैं ।
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“एक बात और ये कहते हैं । एक पक्षी जहाज के मस्तूल पर बैठा था । जहाज गंगा से होकर काले पानी में (समुद्र में) चला गया । पक्षी को इसका होश न था । जब वह होश में आया, तब किनारे का पता लगाने के लिए उत्तर की ओर उड़ गया । उधर भी किनारा न दीख पड़ा । इसी तरह कुछ-कुछ विश्राम करके पूर्व और पश्चिम में भी गया । जब उसने देखा, कहीं किनारा नहीं है, तब मस्तूल पर आकर चुपचाप बैठ गया ।”
श्रीरामकृष्ण – (बूढ़े गोपाल और भक्तों से) – जब तक यह बोध है कि ईश्वर वहाँ है – वहाँ है, तब तक अज्ञान है । जब यहाँ है, यह बोध हो जाता है, तब ज्ञान ।
(क्रमशः)

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