बुधवार, 14 अप्रैल 2021

*प्रीति की रीति कही नहिं जात*

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*दादू बिगसि बिगसि दर्शन करै,*
*पुलकि पुलकि रस पान ।*
*मगन गलित माता रहै,*
*अरस परस मिलि प्राण ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
https://youtu.be/KmeX4d5ItSM
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*संवत चौदह बीत गये हरि,*
*आय कहै चर राम हि देखो ।*
*मानत नांहिं सु राम कहां अब,*
*नाथ मिले कहि मोहि परेखो१ ॥*
*अंग पिछान लिये पहचान,*
*जिये मनु जान नहीं सुख लेखो ॥*
*प्रीति की रीति कही नहिं जात,*
*हिये अकुलात सु प्रेम विशेखो ॥८५॥*
चौदह वर्ष व्यतीत होने पर भगवान् राम आये तब सेवकों ने कहा – रामजी आ गये हैं, दर्शन कर लो ।
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किन्तु उनकी बात सत्य नहीं मान कर बोले – मैं प्राणनाथ सुन्दर श्याम को कहाँ पा सकता हूं । मुझे उनके मिलने का अब विश्वास कहाँ होता है ।
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इतने में भगवान् राम ने आकर उनको उठाकर सप्रेम हृदय के लगाया और कहा – नेत्र खोलकर देखो । तब भगवान् के अंग और उनकी बोली पहचान कर उनको पहचाना ।
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पीछे तो मानो उनके मृत शरीर में प्राण डाल दिये हों ऐसा उनको आनन्द हुआ । जिसका माप नहीं हो सकता । उनकी प्रीति की रीति किसी प्रकार भी मुख से नहीं कही जाती । विशेष प्रेम के कारण उनका हृदय व्याकुल हो रहा था ।
(क्रमशः)

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