🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१५. माया कौ अंग ~ ८९/९२*
.
कहि जगजीवन ठग ठगे, ठगणी माया मोहि ।
देह गमांई देखतां, रांम न चीन्हां सोइ ॥८९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव माया द्वारा ठगे गये ये ठगिनी मोहित कर ठग लेती है । इसके कारण जीव व्यर्थ ही अपना शरीर भी खो देता है और प्रभु कोन पहचान कर अन्य को ही प्रभु मानता रहता है ।
.
रुख१ बिरष२ गिरि कंदला३, भाजि गये सब छोड़ ।
कहि जगजीवन मांहि मन, सके न हरि सूं जोड़ ॥९०॥
(१. रुख=छाया रहित वृक्ष) (२. बिरख=छायादार सघन वृक्ष) {३. गिरि कंदला=पर्वत की कन्दरा(गुफा) }
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव वृक्ष शुष्क वृक्ष सब पर्वत गुफा से पलायन कर गये इतना सब करके भी वे प्रभु से नाता न जोड़ सके । प्रभु से नाता ही कल्याण कारी है ।
.
चंचल मोहे मेदनी४, फिर आये सब कांम ।
कहि जगजीवन विस्वगुरु५, चित्त की जांणै रांम ॥९१॥
(४. मेदनी=पृथिवी) (६. खसम=पति)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि पृथ्वी पर माया से सब जीव ही मोहित होते हैं यह सब को अपने वश में करती है । जो संसार के स्वामी हैं वे ही इसके रहस्य जानते हैं ।
.
मन अति मोटा पड़ि गया, मुगध सही सिर मार ।
कहि जगजीवन खसम६ तजि, घर मैं घालै जार७ ॥९२॥
(७. जार=उतपति; परायी स्त्री से सम्भोग करने वाला)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि मन अत्यंत आलसी हो गया है । और माया मोहित यह दुख सहता है यह सच्चे प्रभु को छोड़कर संसार में अन्यों की आस भरोसा करता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें