शनिवार, 10 अप्रैल 2021

*छाप उपाड़ रु बाँच शिलोकन*

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*आंधी के आनन्द हुआ, नैंनहुँ सूझन लाग ।*
*दर्शन देखे पीव का, दादू मोटे भाग ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*अलर्क की पद्य टीका*
*मैं अलरक्क सु बात बखानत,*
*ज्ञान दियें नहिं जाय विषै है ।*
*जन्म हि आप मदालस के तन,*
*सो गर्भवास हि नांहि पिखै हैं ॥*
*पीव कहें लघु छोड़ गई वन,*
*काढि लियो नृप त्रास दिखै है ।*
*छाप उपाड़ रु बाँच शिलोकन,*
*दौरि गयो दत देव न खै है ॥८२॥*
मैं अलर्क की विशेष बात कथन कर रहा हूँ । लोगों की विषयाषा ज्ञान का उपदेश देने से भी सर्वथा नष्ट नहीं होती है किन्तु अलर्क की सर्वथा नष्ट हो गई थी ।
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अलर्क की माता मदालसा की यह प्रतिज्ञा थी – जो मेरे गर्भ से जन्मेगा वह पुनः गर्भवास को नहीं देखेगा । मदालसा के तीन पुत्र – विक्रान्त, सुबाहु और अरिमर्दन तो पहले ही माता के उपदेश से वनवासी हो गये थे ।
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किन्तु छोटे पुत्र अलर्क को पति के कहने से राज्य शासन के लिये छोड़कर पति के साथ ही मदालसा भी वन को चली गई थी । फिर माता की आज्ञा से विक्रांत आदि भाइयों ने उसे भी युद्ध का भय दिखाकर राज्य की आसक्ति नष्ट करके संसार दशा से निकाल लिया था ।
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भ्राताओं के साथ युद्ध करना रूप क्लेश सामने आने पर माता की आज्ञानुसार भुजबन्ध की चौकी में रक्खे हुये पत्र को किसी संत से सुनने के लिये सब से छिपकर वन को भाग गये और दत्तात्रेय के द्वारा जिसका क्षय नहीं होता उस आत्मदेव को जानकर ब्रह्मानन्द में निमग्न हो गये थे ।
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(विशेष कथा – माता-पिता वन-वासी हो गये हैं, यह सूचना विक्रान्त आदि को मिली तब तीनों भाई माता-पिता के दर्शन करने आये और पिता ऋतुध्वज से प्रार्थना की – कोई सेवा बताइये । पिता ने कहा – तुम्हारी माता से पूछो । माता से पूछने पर माता ने कहा – मेरी प्रतिज्ञा है कि मेरे गर्भ से जन्मा हुआ किसी अन्य के गर्भ में न जाकर मुक्त होना चाहिये । सो तुम लोग तो मोह निद्रा से जाग गये हो किन्तु अलर्क नहीं जगा है । उसे मोह निद्रा से जगाकर मुक्ति का अधिकारी बनाओ ।
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तीनों भाइयों ने माता की आज्ञा स्वीकार की और समय पाकर विक्रांत, सुबाहु और अरिमर्दन तीनों भाई अलर्क के पास गये और विक्रान्त ने कहा – बड़ा मैं हूँ इससे राजा होने का अधिकारी हूं । तुम दूसरा जो भी चाहो – प्रधान मन्त्री, सेनापति आदि कोई भी पद ग्रहण कर सकते हो । अलर्क ने कहा – तुम आरूढ़ पतित क्यों हो रहे हो । जीवन्मुक्ति के आनन्द के सामने राज्य क्या वस्तु है । किन्तु विक्रान्त ने कहा – अब बातों से काम नहीं चलेगा । राज्य तुम को छोड़ना ही पड़ेगा । अलर्क ने नहीं माना ।
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तब तीनों भाइयों ने अपने मामा काशिराज को चतुरंगणी सेना के सहित लाकर अलर्क की राजधानी को घेर लिया । तब अलर्क को माता की वह शिक्षा याद आई जो वन जाते समय दे गई थी – विपत्ति के समय तेरी भुजा में जो चौकी बंधी है, उसमें एक पत्र है, वह किसी संत से सुनना, तेरा दुःख दूर हो जायगा ।
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अलर्क ने सोचा सहोदर भ्राताओं से युद्ध करना होगा, इससे बड़ा दुःख क्या होगा? अलर्क छिपकर पुरी से निकला और वन में गया । वहां भाग्यवश दत्तात्रेय उसे मिल गये । चौकी खोलकर उसमें लिखित यह श्लोक सुना –
‘शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोसि,
संसार माया परिवर्जितोसि ।
संसार स्वप्न त्यज मोह निद्रा,
मदालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ॥
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तू शुद्ध है, ज्ञान स्वरूप है, निरन्जन ब्रह्म रूप है, सांसारिक माया से परे है, संसार स्वप्नवत मिथ्या है, तू मोह निद्रा को त्याग । यह वाक्य मदालसा अपने पुत्र को कहती है । यह सुनते ही अलर्क ब्रह्मानन्द में निमग्न हो गये और विचारने लगे – मैं तो सारे विश्व का सम्राट हूं, मुझे उस तुच्छ राज्य का क्या करना है?
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वे लौट कर आये और विक्रान्त आदि से बोले – यह तुच्छ राज्य सँभालो । मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है, मैं तो संपूर्ण विश्व का सम्राट् हूँ । विक्रान्त यह जानकर कि इन्हें आत्म ज्ञान हो गया है कहा – ऐसे ही विचार से अपने को निर्द्वन्द्व समझकर आप राज्य करैं । हम माताजी की आज्ञा से आपको मोह निद्रा से जगाने के लिये ही आये थे, राज्य के लिये नहीं । अब आप जग गये हैं । हम जाते हैं ।
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वे लोग जाकर माताजी से बोले – अलर्क अब गर्भ में नहीं आयेगा । वह दत्तात्रेय के द्वारा आप के वचन से ज्ञान संपन्न हो गया है । यह सुन कर माता संतुष्ट हुई । अलर्क ने गंगा यमुना के संगम पर अपनी अलर्कपुरी राजधानी बनाई थी, जो आजकल अरैल नाम से प्रसिद्ध है ।)
(क्रमशः)

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