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*साधु निर्मल मल नहीं, राम रमै सम भाइ ।*
*दादू अवगुण काढ कर, जीव रसातल जाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निन्दा का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###.
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- पवित्र सती
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एक श्रेष्ठ संत के पास एक सती माता सत्संग के निमित जाती थी । दुष्टों ने उस पर व्यभिचार का कलंक लगाया । यह बात जब संत और सती को ज्ञात हुई तो उन्हें दु:ख हुआ । उनका आश्रय एक मात्र ईश्वर ही था ईश्वर ने उनके उस कलंक को दूर करने के लिये नगर के परकोटा के चारों द्वार बंद कर दिये तथा वज्र समान कठोर भी कर दिये । तीन दिन हो गये नगर निवासियों के व्यवहार में बाधा पड़ी, नगर में हाहाकार मच गया । राजा प्रजा ने ईश्वर से प्रार्थना की ।
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आकाशवाणी ने कहा "यदि कोई पतिव्रता स्त्री कच्चे सूत के एक धागे से कूप में से जल का घड़ा निकाल कर, उसे चलनी में डाल कर कपाटों पर छिड़कावे तो द्वार खुल जायेंगे ।" किसी भी स्त्री की हिम्मत नहीं हुई ।अंत में जिसकी निंदा करते थे उसी ने आकाशवाणी के कथानुसार किया । द्वार खुल गये । दुष्टों के मुख नीचे हुए, सारे नगर ने सती की पूजा की ।
दोष लगाये सती के, होती हानि महान ।
नगर बंध जनता दुखी, अन्त सती का मान ॥६२॥

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