शनिवार, 10 अप्रैल 2021

*१५. माया कौ अंग ~ ७३/७६*

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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१५. माया कौ अंग ~ ७३/७६*
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मनसा३ फैली जगत मैं ज्यूं चकमक४ की आगि ।
नीर नांम बिन क्यों बुझै, जगजीवन सौं लागि ॥७३॥
(३. मनसा=वासना) (४. चकमक=वह पत्थर जिस को रगड़ने से अग्नि निकलती है)
संतजगजीवन जी कहते है कि मन आशा संसार में ऐसी फैल कर जलाती है यथा चकमक में आग जो दिखती तो नहीं है । पर संसार भर को जला देती है ऐसी दुख रुपी अग्नि भजन रुपी जल के बिना कैसे बुझ सकती है ।
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कोरा५ रीता६ रहि गया, छती बसत नर छैल ।
मनसा फैली जगत मैं, जगजीवन मन मेल ॥७४॥
{५.कोरा=नया(घड़ा)} (६. रीता=खाली)
संतजगजीवन जी कहते है कि मनुष्य रुपी घट नाना ऐश्वर्य से हरा होकर भी खाली ही रह गया । यदि उसकी आशा संसार से जुड़ी रही व मन कलुषित रहा तो उसकी सार्थकता रही ही नहीं ।
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घर मंदिर सुत नारि सूं, मोह कीया तजि नांम ।
कहि जगजीवन इहै चिति, दांम चांम अरु कांम ॥७५॥
संतजगजीवन जी कहते है कि जीव ने गृह, पुत्र रिश्ते, स्त्री से ही स्नेह किया और भजन बिल्कुल नहीं किया तो उसका चित भी धन सौन्दर्य, व कामनाओं में ही रमा रहेगा ।
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जगजीवन भूखी दुनियां, क्यूं ही धापै७ नांहि ।
सकल लोक की संपदा, जे आवै घर मांहि ॥७६॥
(७. धापै=सन्तुष्ट, तृप्त)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि यह दुनिया भूखी है भांति भांति की वासनाओं की भूख इसे संतुष्ट नहीं होने देती है । चाहे संसार की सारी संपति ही इसकी क्यों न हो जाये ।
(क्रमशः)

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