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*दादू एता अविगत आप थैं, साधों का अधिकार ।*
*चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- माता पिता का कर्तव्य
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महामुनि मृकण्ड के सन्तान न थी । उनकी पत्नी मरुदगति और उनने भगवान शंकर की उपासना की । पुत्र मिला किंतु अल्पायु । बालक मार्कण्डेय की आयु १६ वर्ष की थी । यह उनके पिता को ज्ञात था । पिता ने पुत्र को सिखाया - "बेटा ! तुम जिस किसी ब्राह्मण को देखो उस विनयपूर्वक प्रणाम अवश्य करना ।"
एक दिन सप्त ऋषिगण मार्कण्डेय के आश्रम के समीप से निकले । मार्कण्डेयजी ने प्रत्येक को बड़े प्रेम से प्रणाम किया । प्रत्येक ऋषि ने उन्हे दीर्धायु होने का आशीर्वाद दिया, फिर वशिष्ठ ने बालक की ओर देखकर कहा कि - "हम लोगों ने इसे दीर्धायु होने का आशीर्वाद दिया है, किंतु इसकी आयु तो केवल तीन दिन शेष रहे है ।" फिर ऋषियों ने अपनी वाणी सत्य करने के लिये उद्योग किया, जिससे मार्कण्डेय दीर्धायु, विद्वान, यशस्वी और महान् तपोबल सम्पन्न हो गये ।
प्रणति करे से बढत है, विद्या, यश, बल, आयु ।
प्रणति प्रताप हि से भये, मार्कण्डेय दीर्धायु ॥२३॥

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