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*दादू रूप राग गुण अनुसरे, जहँ माया तहँ जाइ ।*
*विद्या अक्षर पंडिता, तहाँ रहे घर छाइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*विद्या माहात्म्य का अंग १४७*
इस अंग में विद्या महात्म्य संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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विद्या करि माया मिलै, विद्या ब्रह्म गियान१ ।
रज्जब विद्या वस्तु है, शोध२ हु विद्या थान३ ॥१॥
विद्या से माया मिलती है और ब्रह्म ज्ञान१ भी मिलता है विद्या ब्रह्म वस्तु की प्राप्ति का साधन है विद्या के द्वारा अपने परम धाम३ रूप ब्रह्म को खोजो२ ।
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विद्या मोहै विदुजन१ हुं, विद्या वश सुलतान ।
रज्जब विद्या परम धन, सीख हु चतुर सुजान ॥२॥
विद्या विद्वानों१को भी मोहित करती है, बादशाह भी विद्या के वश होते हैं, विद्या परम धन है, हे सुजान ! विद्या पढकर चतुर बनो ।
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चौदह विद्या में चलै, आदम१ की औलाद२ ।
जन रज्जब विद्या बिना, पशू जन्म सो बाद३ ॥३॥
मनुष्य की सन्तान - चार वेद, छ: वेद के अंग, धर्म शास्त्र, पुराण, मीमाँसा और तर्क शास्त्र इन चौदह विद्याओं में चलती है अर्थात किसी न किसी विद्या से युक्त होती है और जो विद्या से रहित है, वह पशु जन्म के समान व्यर्थ१ ही है ।
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बुधि१ विद्या बलवंत जग, पूजा ता की मान२ ।
रज्जब गर्जै गोइ३ गुण, सब इल४ आदर जान ॥४॥
जिसकी बुद्धि१ विद्या युक्त होती है, वही जगत में बलवान होता है, उसकी सम्मान२ पूर्वक पूजा होती है, इस विद्या रूप गुप्त३ गुण वाला गर्जता है अर्थात प्रवचन देता है तब सब पृथ्वी४ पर उसका आदर होता है यह सत्य ही जानो ।
(क्रमशः)

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