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*दादू जब प्राण पिछाणै आपको, आत्म सब भाई ।*
*सिरजनहारा सबनि का, तासौं ल्यौ लाई ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ दया निर्वैरता का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*रन्तिदेव की पद्य टीका*
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*देव सु रन्ति कुले दुष्यन्त हु,*
*वृत्ति अकाशहि धारि लिई है ।*
*खाय नहीं बिन दीन अभ्यागत,*
*वास१ करे यह बात नई है ॥*
*ह्वै अठचालिस ध्यौस मिली ऋषि,*
*ब्राह्मण शुद्र श्वपाक दिई है ।*
*राम विचार चहूं जन में हरि,*
*देन लगे दुख देहु कही है ॥८३॥*
राजा दुष्यन्त के कुल में संकृति नाम से एक महाराज हुये हैं, उनके दो पुत्र थे – गुरु और रन्तिदेव । रन्तिदेव का, अपने कष्टों की परवाह नहीं करके दूसरों के कष्ट स्वयं झेल कर दुखियों को सुखी बनाना ही, उद्देश्य था । दुखियों की सेवा करने में ही उनका राजकोश खाली हो गया था । उनके खाने के लिये भी कुछ नहीं रहा था । राज्य में अकाल भी पड़ गया था । तब आप अपने परिवार को लेकर वन में चले गये थे । वहां भी इन्होंने आकाश वृत्ति धारण की थी अर्थात् इनकी अनिश्चित जीविका थी ।
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स्वतः कुछ मिल जाता था वह दीन गरीबों, अभ्यागतों आदि को दिये बिना नहीं खाते, उपवास१ ही कर जाते थे । यह उनकी एक नवीन रीति थी ।
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एक समय अठतालीस उपवास हो चुकने पर ४९ वें दिन हरि कृपा से कहीं से घृत मिश्रित खीर, हलुवा और जल रूप कुछ ऋद्धि मिली । जब ये खाना ही चाहते थे तब प्रथम एक ब्राह्मण आया । उसे जिमाया फिर एक भूखा शूद्र आया उसको दिया । पुनः एक चाण्डाल को दिया शेष बचा सो एक भूखे कुत्ते को खिला दिया । अब इनके पास जल भी नहीं रहा था ।
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चारों ही प्राणियों की आत्मा को राम स्वरूप जानकर ही उन्होंने ऐसा किया था और आप परिवार के साथ भूखे प्यासे ही रह गये थे । तब भगवान् ने प्रकट होकर इन्हें दर्शन दिया और वर देने लगे । तब इनने कहा – प्रभो ! संपूर्ण प्राणियों का दुःख मैं ही भोग लूं किसी को भी दुःख नहीं हो वही वर मुझे दीजिये । इससे प्रसन्न होकर हरि ने इन्हें निज धाम प्रदान किया था ।
(क्रमशः)

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