रविवार, 11 अप्रैल 2021

*१५. माया कौ अंग ~ ७७/८०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१५. माया कौ अंग ~ ७७/८०*
.
जगजीवन धापै दुनी, त्यौं त्यौं तृषनां तेज ।
राजा राणा पातिसाह, सुखी न सोवै सेज ॥७७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जितना यह संतुष्ट होने का प्रयास करता है जीव उतना ही तृषित होता है चाहे वह राजा हो राणा हो या बादशाह हो वे कभी सुख पूर्वक नहीं सोते हैं ।
.
पेट मांहि परवत गिलैं, परस्या थैं कहा पार ।
कहि जगजीवनदास नर, कछु सिमर्यां१ हीं आधार ॥७८॥
{१. सिमर्यां=स्मरण(राम भजन) करने से}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिनकी भूख पर्वत जैसी है वह किसी के परोसने से कैसे मिटेगी परोसने वाला तो सामर्थ्य से ही परोसेगा । अतः हे जीव सिमरण रुपी सुदृढ धरा होने पर ही आशा रुपी पर्वत टिक पायेगा ।
.
षुध्या पेट की सुलभ है, तीन पांच कै सेर ।
कहि जगजीवन मन षुध्या, भरै न उदर सुमेर ॥७९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि भूख तो जितनी उदरपूर्ति के लिए चाहिए उतनी ही उचित है चाहे वह सेर भर हो या तीन, पांच सेर की हो । किंतु मन की भूख तो कभी पूर्ण नहीं होती चाहे कितना ही उसके समक्ष क्यों न रख दिये जायें । वह पर्वत रुपी उदर भरता ही नहीं है ।
.
भुगतै नारी पदमनी, बिलसै सकल बिलास ।
जगजीवन इस जीव की, तोउ न बुझै पियास ॥८०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव चाहे कितनी ही सौन्दर्यवती व ऐश्वर्य युक्त स्त्री के संग हो, इस जीव की तृषा और पाने की चाह कभी नहीं बुझती है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें