🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🌷🙏 *#श्री०रज्जबवाणी* 🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*राम विसार जन्म जनि खोवै,*
*जपले जीवन साफल होवै ॥*
*सार सुधा सदा रस पीजे,*
*दादू तन धर लाहा लीजे ॥*
===============
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
.
*विद्या माहात्म्य का अंग १४७*
.
विद्या जीवै जीव लग१, मुवौं मरे सो नाँहिं ।
रज्जब रहती देखिये, गुरु गति२ मति शिष माँहिं ॥१३॥
विद्या जीव के साथ जीवन पर्यन्त१ लगी रहती है, मरने पर यह मरती नहीं, गुरु की बुद्धि की चेष्टा२ शिष्य में आकर रहती हुई देखी जाती है ।
.
विद्यों१ परि२ विद्या भजन, काज करै परलोक ।
और जगत के नाम की, रज्जब पावै धोक३ ॥१४॥
अन्य विद्याओं१ से भजन रूप विद्या श्रेष्ठ२ है, कारण-भजन परलोक का कार्य करता है, अन्य सब विद्या तो जगत के काम की हैं, फिर भी विद्या वाले को सर्व साधारण प्रणाम३ ही करते हैं ।
.
विद्या चौदह रतन है, वपु सु वारि निधि मांहिं ।
को इक काढे कमठ ह्वै, नहिं तो निकसे नांहिं ॥१५॥
जैसे समुद्र में चौदह रतन थे, वैसे ही शरीर में चौदह विद्या रूप रत्न हैं, समुद्र के रत्नों की कच्छप ने निकाला था, वैसे ही विद्या को कोई कच्छप के समान हो वही निकाल सकता है, नहीं हो तो नहीं निकलती ।
.
कहे सुने बूझै१ वचन, विद्या दे वरदान ।
रज्जब तीन्यों तन नहीं, तो क्यों परसै२ गुरु ज्ञान ॥१६॥
वचन कहने से, सुनने से, प्रश्न१ करने से विद्या वरदान देती है अर्थात आती है, जिसमें ये तीनों नहीं हों तो गुरु ज्ञान कैसे मिल२ सकता है ?
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित विद्या माहात्म्य का अंग १४७ समाप्तः ॥सा. ४५७४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें