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*दादू जैसे मांहि जीव रहै, तैसी आवै बास ।*
*मुख बोले तब जानिये, अन्तर का परकास ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पारिख का अंग)*
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*सौजन्य ~ #भक्तमाल*, *रचनाकार ~ स्वामी राघवदास जी,*
*टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान*
*साभार ~ श्री दादू दयालु महासभा*, *साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ*
*मार्गदर्शक ~ @Mahamandleshwar Purushotam Swami*
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*बात सुनो नृप गात तिया सुत,*
*चोर हि भीर१ नहीं लव भाखै ।*
*शीश करौत धर्यो सु चिर्यो मुख,*
*नीर ढर्यो दृग भीर न चाखै२ ॥*
*छोड़ चले गहि पाँव कहै इमि,*
*रोवत है बिन काम हि नाखै ।*
*नैन लिये भरि रूप धर्यो हरि,*
*दूरि कर्यो दुःख है अभिलाखै ॥८०॥*
ब्राह्मण ने कहा – मेरी बात सुनो – उस सिंह ने कहा था – राजा के अंग को रानी और उसका पुत्र दोनों मिलकर करवत से चीरें और चीरते समय लेश मात्र भी तीनों को दुःख१ नहीं होना चाहिये । इससे पुत्र को वह स्वीकार नहीं करेगा ।
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तब राजा के शिर पर करवत धरा और एक ओर से रानी तथा दूसरे ओर से राजकुमार ने पकड़ा और चीरने लगे । मुख तक चिरा होगा कि राजा के नेत्र में अश्रु आ गया किंतु वह दुःख का अनुभव करके नहीं आया था ।
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अश्रु देखकर ब्राह्मण छोड़कर चलने लगे । तब उनके चरणों को पकड़ कर उनको रोका और कहा – भगवन् ! यह अश्रु बाँये नेत्र में इसलिये आया है कि – दाहिना अंग तो काम आ जायगा और मैं बायाँ अंग बिना काम व्यर्थ ही फैंका जाऊंगा ।
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राजा का यह वचन सुनकर तथा उसके हृदय के भाव को देखकर हरि के नेत्र जल से भर आये और हरि ने चतुर्भुज रूप धारण कर लिया तथा राजा के शिर पर हाथ धर कर तत्काल राजा का सब दुःख दूर कर दिया और कहा जो भी अभिलाषा हो वही माँग लो ।
(क्रमशः)

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