रविवार, 11 अप्रैल 2021

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*सबै कसौटी शिर सहै, सेवक सांई काज ।*
*दादू जीवन क्यों तजै, भाजे हरि को लाज ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ शूरातन का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###.
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- कर्म
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एक डाकू को अपने पूर्व कर्म का विचार हृदय पर आ जाने से सहसा वैराग्य हुआ । वह एक संत के पास गया और शिष्य होने के लिये प्रार्थना की । संत ने उसे एक डंडा देकर कहा - जाओ प्रथम तीर्थ कर आओ जहां यह दण्डा हरा हो जाय वहां से लौट आना ।
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वह चला एक दिन एक वन में रात्रि को एक देवी के मंदिर में ठहरा । रात्रि में चार व्यक्ति इसके पास वाली कोठरी में आकर ठहर गये और परस्पर बातें करने लगे । आज इस गांव को लूटना चाहिये किंतु अमुक मनुष्य इसमें वीर है, इसलिये प्रथम उसकी गौशाला में अग्नि लगा दी जाय इससे वह अग्नि बुझाने में लग जायगा तथा और भी बहुत मनुष्य ऊधर चले जायेंगे । पीछे से सुगमता से हम धन निकाल कर ले सकेंगे ।
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इनकी ये सब बातें इसने सुनी और सोचा ये अपने स्वार्थ के लिये बहुतों की हिंसा करेंगे । मैंने तो बहुत मनुष्य मारे हैं क्या चार और सही, इन को मार कर बहुत गौएं तथा अन्यान्य प्राणियों की रक्षा तो कर सकूंगा । यह निश्चय कर सचेत रहा जब उनको कुछ नींद आई तब उसने दंडे से सोये हुए चारों को मार चल दिया । प्रात: देखता है कि दण्डा तो हरा हो गया । बस गुरुजी के पास आ गया ।
स्वार्थ रहित शुचि भाव से, कुकर्म से शुभ होय ।
चार हते दंड हरित, पाप हुआ नहीं कोय ॥३२॥

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