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*दादू पूरणहारा पूरसी,*
*जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी,*
*सकल निरंतर राम ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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“कामिनी और कांचन में मन का व्यर्थ में व्यय होता है । यह देखो न, बाल-बच्चे हुए हैं, नाटक में काम करना पड़ रहा है – इन सब अनेक कर्मों में कारण ईश्वर में मन का योग नहीं हो पाता ।
“भोग रहने से ही योग घट जाता है । भोग रहने से ही कष्ट होता है । श्रीमद्भागवत में कहा है – अवधूत ने अपने चौबीस गुरुओं में चील को भी एक गुरु बनाया था । चील के मुँह में मछली थी, इसीलिए हजार कौओं ने उसे घेर लिया । मछली को मुँह में लेकर वह जिधर जाती थी उधर ही सब कौए काँव काँव करके उसके पीछे भागते थे । पर जब चील के मुँह से अपने आप मछली गिर गयी, तो सब कौए मछली की ओर दौड़े, चील की ओर फिर न गये ।
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“मछली अर्थात् भोग की चीज । कौए हैं चिन्ताएँ । जहाँ भोग है वहीँ चिन्ता है । भोगों का त्याग होने से ही शान्ति होती है ।
“फिर देखो, अर्थ ही अनर्थ हो जाता है । तुम भाई भाई अच्छे हो, परन्तु भाई भाई में बटवारे के प्रश्न पर झगड़ा होता है । कुत्ते आपस में एक दूसरे को चाटते हैं, खूब प्रेम भाव रहता है । परन्तु उन्हें यदि कोई भात, रोटी आदि कुछ फेंक दे, तो आपस में वे एक दूसरे को काटने लगेंगे ।
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“बीच-बीच में यहाँ पर आते जाना । (मास्टर आदि को दिखाकर) ये लोग आते हैं, रविवार या किसी दूसरे अवकाश के दिन आते हैं ।”
विद्या – हमारा रविवार तीन मास का होता है । श्रावण, भाद्रपद और पौष – वर्षाकाल और धान काटने का समय । जी, आपके पास आये, यह तो हमारा अहोभाग्य है !
“दक्षिणेश्वर में आते समय दो व्यक्तियों का नाम सुना था – आपका और ज्ञानार्णव का ।”
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श्रीरामकृष्ण – भाइयों के साथ मेल रखकर रहना । मेल रहने से ही देखने सुनने में सब भला होता है । नाटक में नहीं देखा ? चार व्यक्ति गाना गा रहे हैं, परन्तु यदि प्रत्येक व्यक्ति अलग अलग तान छेड़ दे तो नाटक पर ही पानी फिर जायगा !
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विद्या – जाल में अनेक पक्षी फँसे पड़े हैं । यदि एक साथ चेष्टा करके जाल लेकर एक ही दिशा में उड़ जायँ तो बहतु कुछ बचाव हो सकता है । परन्तु यदि प्रत्येक पक्षी अलग अलग दिशा में उड़ने की चेष्टा करे, तो कुछ नहीं होता । नाटक में भी देखने में आता है, सिर पर घड़ा, और नाच रहा है ।
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श्रीरामकृष्ण – गृहस्थी करो, परन्तु सिर पर घड़े को ठीक रखो अर्थात् ईश्वर की ओर मन को स्थिर रखो ।
“मैंने पलटन के सिपाहियों से कहा था, तुम लोग संसार का कामकाज करोगे, परन्तु कालरूपी(मृत्युरूपी) मूसल हाथ पर पड़ेगा, इसका ख्याल रखना ।
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“उस देश में बढ़ई लोगों की औरतें ओखली में चिउड़ा कूटती है । एक औरत मूसल को उठाती और गिराती है, और दूसरी चिउड़ा उलट देती है – यह ध्यान रखती है कि कहीं मूसल हाथ पर न पड़ जाय । इधर बच्चे को स्तन-पान भी कराती है और एक हाथ से भीगे धान को चूल्हे पर रखकर पतीले में भून लेती है । फिर ग्राहक के साथ बातचीत भी करती है, कहती है, तुम्हारे ऊपर इतने पैसे पहले के उधार हैं, दे जाना ।
“ईश्वर में मन रखकर इसी प्रकार संसार में अनेकानेक कामकाज कर सकते हो, परन्तु अभ्यास चाहिए और होशियार रहना चाहिए, तब दोनों ओर की रक्षा होती है ।”
(क्रमशः)

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