रविवार, 11 अप्रैल 2021

विनती कौ अंग ३४ - ५३/५६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज,व्याकरण वेदांताचार्य श्रीदादू द्वारा बगड़,झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज,बगड़ झुंझुनूं । साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी ~ विनती कौ अंग ३४ - ५३/५६)*
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*दादू जग ज्वाला जम रूप है, साहिब राखणहार ।*
*तुम बिच अन्तर जनि पड़ै, तातैं करूँ पुकार ॥५३॥*
अहो ! ये लोग तो काम क्रोध की अग्नि की तरह जलाने वाले ही हैं । रक्षक तो एक मात्र राम ही हैं । हे राम ! मैं बार-बार प्रार्थना करता हूं कि आपके और मेरे बीच में कोई सांसारिक अन्तराल नहीं पडना चाहिये ॥५३॥
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*जहँ तहँ विषय विकार तैं, तुम ही राखणहार ।*
*तन मन तुम को सौंपिया, साचा सिरजनहार ॥५४॥*
मैंने अपना जीवन यथार्थ सृष्टिकर्ता मान कर आपको समर्पण कर दिया । अतः जहां कहीं भी इन्द्रियों के विषय विकारों में यदि चित्तवृत्ति जाय तो आप उसकी रक्षा कर के अपनी शरणागत वत्सलता का परिचय दीजिये ॥५४॥
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*॥ दया विनती ॥
*दादू कहै- गरक रसातल जात है, तुम बिन सब संसार ।*
*कर गहि कर्त्ता काढि ले, दे अवलम्बन आधार ॥५५॥*
हे प्रभो ! संसारी प्राणी महामाया से मोहित होकर परब्रह्म परमात्मा को सर्वत्र नहीं देखते । अतः वे मूढ अधोगति को जा रहे हैं । आप कृपा करके दया रुपी हाथों का अवलम्बन देकर अधोगति से बचाइये । क्योंकि आपकी कृपा ही सदा सब का आधार माना गया है ॥५५॥
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*दादू दौं लागी जग प्रज्वलै, घट घट सब संसार ।*
*हम तैं कछू न होत है, तुम बरसि बुझावणहार ॥५६॥*
हे परमेश्वर ! प्रत्येक प्राणि के हृदय में यह भयंकर भेद बुद्धि भरी पडी है । उसी से यह जीव जल रहा है । अतः हे प्रभो ! आप ही हमारी रक्षा कीजिये । क्योंकि यह जीव अपने भेद को मिटाने में स्वयं समर्थ नहीं है । आप अपनी दया दृष्टि की वर्षा करके इस भेदाग्नि को नष्ट कीजिये । जिससे प्राणियों का उद्धार हो जावे ॥५६॥
(क्रमशः)

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