रविवार, 11 अप्रैल 2021

*सर्व ठौर सावधान का अंग १४८(१/४)*

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*दादू राजस कर उत्पत्ति करै,*
*सात्विक कर प्रतिपाल ।*
*तामस कर परलै करै, निर्गुण कौतिकहार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*सर्व ठौर सावधान का अंग १४८*
इस अंग में सब स्थानों में सचेत प्रभु को समझ कर सदा सावधान रहना चाहिए यह कहते हैं ~
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मोटे छोटे जीव सब, प्रकट गुप्त कलि माँहिं ।
जन रज्जब जगदीश सौं, कोई छाना नाँहिं ॥१॥
छोटे मोटे जो भी जीव प्रकट या गुप्त इस कलियुग में हैं, वे सर्व ठौर सावधान जगदीश्वर से कोई भी छिपे हुये नहीं हैं ।
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परा पश्यंती प्रकट बिन१, गोविन्द गोप्य२ सु नांहिं ।
यहु जाणें३ जाणें४ नहीं, वहिं५ सौं छाना नांहिं ॥२॥
परा और पश्यंती वाणी प्रकट नहीं१ है किंतु गोविन्द से गुप्त२ भी नहीं है, यह जीव तो जानता३ है कि - गोविन्द मेरी चालाकी को नहीं जानते४ होंगे किंतु उन सर्व ठौर सावधान प्रभु५ से कुछ भी छिपा हुआ नहीं है ।
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ब्रह्माण्ड पिण्ड के जीव जे, शून्य१ रु साहिब२ माँहिं ।
नमो निरत३ परि रज्जबा, काहू४ भूलै नांहिं ॥३॥
आकाश१ और व्यापक ब्रह्म२ में जो भी ब्रह्माण्ड और पिंड के जीव हैं, उनमें किसी४ को भी नहीं भूलते, सबका भरण-पोषण करते हैं, उन सर्व ठौर सावधान ईश्वर की कार्य तत्परता३ को नमस्कार है ।
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सब ठाहर चेतन्न१ है, रज्जब रमता राम ।
इस समझै का फल इहै२, बुरा न कीजे काम ॥४॥
सबमें रमने वाले राम सब स्थानों में सावधान१ रहते हैं, इस बात को समझने का फल यही है कि - समझने वाले से इस२ संसार में बुरा काम नहीं किया जा सकता है । जब मनुष्य के देखते भी लोग बुरा काम नहीं करते तब प्रभु के देखते कैसे कर सकते हैं ?
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सर्व ठौर सावधान का अंग १४८ समाप्त ॥४५७८॥
(क्रमशः)

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