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*दादू मिश्री मिश्री कीजिये,मुख मीठा नाँहीं ।*
*मीठा तब ही होइगा, छिटकावे माँहीं ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ साँच का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*आत्मदर्शन या ईश्वरदर्शन का उपाय-साधुसंग या विज्ञान(साइन्स) ?*
विद्या – जी, इसका क्या प्रमाण है कि आत्मा शरीर से पृथक् है ?
श्रीरामकृष्ण – प्रमाण ? ईश्वर को देखा जा सकता है । तपस्या करने पर उनको कृपा से ईश्वर का दर्सन होता है । ऋषियों ने आत्मा का साक्षात्कार किया था । साइन्स से ईश्वरतत्त्व जाना नहीं जाता, उसके द्वारा केवल इन इन्द्रियग्राह्य बातों का पता लगता है कि इसके साथ उसे मिलाने पर यह होता है और उसके साथ इसे मिलाने पर यह होता है; इसीलिए इस बुद्धि के द्वारा यह सब समझ नहीं जाता । साधुसंग करना होता है । वैद्य के साथ रहते रहते नाड़ी परखना आ जाता है ।
विद्या – जी, अब समझा ।
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श्रीरामकृष्ण – तपस्या चाहिए, तब वस्तु की प्राप्ति होगी । शास्त्र के श्लोकों को रट लेने से भी कुछ न होगा । ‘गांजा गांजा’ मुँह से कहने से कहने से नशा नहीं होता । गाँजा पीना पड़ता है ।
“ईश्वर-दर्शन की बात लोगों को समझायी नहीं जा सकती । पाँच वर्ष के बालक को पति-पत्नी के मिलने के आनन्द की बात समझायी नहीं जा सकती ।”
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विद्या – जी, आत्मदर्शन किस उपाय से हो सकता है ?
इसी समय राखाल कमरे में भोजन करने बैठ रहे थे । परन्तु वहाँ अनेक लोग हैं, इसलिए सोच-विचार कर रहे हैं । श्रीरामकृष्ण आजकाल राखाल का गोपाल-भाव से पालन कर रहे हैं । - ठीक मानो माँ यशोदा का वात्सल्य-भाव ।
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श्रीरामकृष्ण(राखाल के प्रति) – खा न रे ! ये लोग नहीं तो उठकर एक और खड़े हो जायँ । (एक भक्त के प्रति) राखाल के लिए बर्फ रखो । (राखाल के प्रति) तू फिर बन-हुगली जायगा ? धूप में न जाना ।
राखाल भोजन करने बैठे । श्रीरामकृष्ण फिर विद्या का अभिनय करने वाले लड़के के साथ वार्तालाप कर रहे हैं ।
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(२)
*आत्मदर्शन का उपाय*
श्रीरामकृष्ण – (विद्या अभिनेता के प्रति) – आत्मदर्शन का उपाय है व्याकुलता । मन, वचन और कर्म से उन्हें पाने की चेष्टा । जब देह में काफी पित्त जम जाता है, तो सभी चीजें पीली दीखती हैं; पीले के अतिरिक्त दूसरा कोई रंग नहीं दिखता ।
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“तुम नाटकवालों में जो लोग केवल औरतों का काम करते हैं, उनका प्रकृतिभाव हो जाता है । औरतों का चिन्तन करके औरतों की तरह चलना-फिरना, सभी कुछ उनके समान हो जात है । इसी प्रकार रात-दिन ईश्वर का चिन्तन करने पर उन्हीं का स्वभाव प्राप्त हो जाता है ।
“मन को जिस रंग में रँगवाओगे उसका वही रंग हो जाता है । मन मानो धोबी के घर का धुला हुआ कपड़ा है ।”
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विद्या – तो इसे एक बार पहले धोबी के घर भेजना होगा ।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, पहले चित्तशुद्धि, उसके बाद मन को यदि ईश्वर-चिन्तन में छोड़ दो, तो उसी रंग का बन जायगा । फिर यदि संसार करो, नाटकवाले का काम करो या जो कुछ भी करो, उसी प्रकार का बन जायगा ।
(क्रमशः)

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