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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१५. माया कौ अंग ~ १५७/१६०*
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बींदी थैं बींदी उभै, ता मंहि एक निवास ।
त्रिय बींदी१ तजि रांम भजि, सु कहि जगजीवनदास ॥१५७॥
{१. त्रिय बींदी=तीन गुण(सत्त्व, रज, तम)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जीव व आत्म दो गुण हैं जिनका धर्म एक ही है वे हैं परमात्मा जो उनमे निवसते हैं, देह के तीनों सत्व, रजो, व तमोगुण से परे हैं, हे जीव राम भजन करें ।
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कहि जगजीवन रांम बिन, देह भ्रमै ज्यूं भांन ।
रस मंहि राखन की जुगति, जानैं जांन सुजान२ ॥१५८॥
{२. सुजान=समझदार(ज्ञानी)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि बिना राम के यह देह ऐसे जीवन यापन करती है जैसे नियम से बंधे लोग सूर्य उदयास्त का नियम निर्वहन करते हैं । इसे सार युक्त बनाने की प्रक्रिया तो विज्ञ ही जानते हैं ।
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अविगत रोप्या रांमजी, रूपा मांहै रूप ।
कहि जगजीवन राजा प्रजा, सुर नर मोहे भूप ॥१५९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सब वही चाहते हैं जो स्वयं को अच्छा लगे जो प्रभु भजन को अच्छा जानते हैं वे विरले ही संत हैं ।
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सब कूं भावै एक सी, सब ही अंग सुहाइ ।
कहि जगजीवन रांम रटि, कोइ जन समझै ताहि ॥१६०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु आपने सब रुपों में अद्भुत सौन्दर्य प्रदान किया है । जो राजा प्रजा सभी को मोहित किये हैं ।
(क्रमशः)
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