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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज,व्याकरण वेदांताचार्य श्रीदादू द्वारा बगड़,झुंझुनूं ।
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #. १)*
॥ श्रीपरमात्मने नमः ॥
नित्यं बोधमयं देवं तेज: पुञ्जं निरञ्जनम् ।
सच्चिदानन्दरूपं तं दादूरामं नमाम्यहम् ॥
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अथ राग गौड़ी ॥१॥
१. स्मरण शूरातन नाम निश्चय ॥त्रिताल॥
*राम नाम नहीं छाडूं भाई,*
*प्राण तजूं निकट जीव जाई ॥टेक॥*
*रती रती कर डारै मोहि,*
*साँई संग न छाडूं तोहि ॥१॥*
*भावै ले सिर करवत दे,*
*जीवन मूरी न छाडूं तोहि ॥२॥*
*पावक में ले डारै मोहि,*
*जरै शरीर न छाडूं तोहि ॥३॥*
*अब दादू ऐसी बन आई,*
*मिलूं गोपाल निसान बजाई ॥४॥*
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भा० दी०-हे तात ! वयं प्रियप्राणानपि त्यक्ष्याम: । न हि मे प्राणेषु मोहोऽस्ति । अयं जीवात्माऽपि शरीरं विमुच्य गच्छतु, तथापि रामस्मरणं न त्यक्ष्यामि। शरीरमिदं खण्डश: क्रियताम्, भस्मीभवतु वा, तदपि जीवनसर्वस्वं प्रभुस्मरणं कदापि न विस्मरिष्यामि । यस्यैतादृशी भगवन्नामस्मरणे निष्ठा भवेत्तर्हि स: नि:संशयं साधको भगवन्तं प्रभुं प्राप्तुं शक्नुयात् । श्रद्धाप्रधाना हि भगवद्भक्तिर्भवति ।
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मैं अपने प्रिय प्राणों को भी हरि भक्ति के लिये त्याग सकता हूं, क्योंकि मुझे प्राणों से कोई प्रेम नहीं है । यह जीवात्मा प्राणों को छोड़ कर भले ही चला जाय, मेरे शरीर के कोई टुकड़े-टुकड़े कर दे, या अग्नि में जला दे लेकिन हरि स्मरण को मैं नहीं त्याग सकता ।
मेरे जीवन का सर्वस्व सार हरि स्मरण ही है । शरीर से मेरा कोई लगाव(अध्यास) नहीं है । यदि भगवन्नाम स्मरण में किसी की ऐसी दृढ़ निष्ठा बन जाय तो वह निःसंशय डंके की चोट से भगवान् को प्राप्त हो जाता है, क्योंकि भगवान् की भक्ति में श्रद्धा-विश्वास ही प्रधान माना गया है ।
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आर्तत्राणपरायण स्तोत्र में लिखा है कि- जिसके नाम-स्मरण मात्र से दुर्जन भी अपार संसार को पार करके भगवान् विष्णु के शाश्वत पद को प्राप्त हो जाता है, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।जब दुर्जन भी पार हो जाता है तो मैं तो हरि का दास हूं । ऐसे आर्त भक्तों की रक्षा करने वाले भगवान् ही मेरी गति हैं ।
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भागवत में कहा है कि – जो स्त्री, पुत्र, घर, आप्तवर्ग, प्राण और धन इन सब को त्याग कर केवल मेरी शरण में आ जाता है, मैं उसको कैसे त्याग सकता हूं ? जैसे प्रह्लादजी ने भयंकर शस्त्रों से पीड़ित होते हुए भी हरि ध्यान को नहीं छोड़ा ।
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नृसिंहपुराण में लिखा है कि- जिनके दांत विष से जल रह थे तथा जिनकी दाढें विकराल हैं, स्पष्ट दिखायी देने वाले हजारों चमकीले दांतों के कारण भयानक प्रतीत हो रहे थे, ऐसे सांपों के गण क्रोध से फुफकारते हुए बड़े वेग से उस हरिभक्त प्रह्लाद के ऊपर टूट पड़े । भगवान् के स्मरण के बल से जिनका शरीर दुर्भेद्य हो गया था, उन प्रह्लादजी के शरीर की थोड़ी सी चमड़ी को काटने में विषधर सर्प समर्थ नहीं हो सके ।
इतना ही नहीं, जिनका शरीर ध्यान के कारण भगवन्मय हो गया था, उन प्रह्लादजी को केवल डसने मात्र से सर्प अपने दांत खो बैठे । तदनन्तर रक्त की धारा बहने से जिनका आकार विषादग्रस्त हो रहा था, जिनके दांतों के दो दो टुकड़े हो गये थे, बार-बार उच्छ्वास/श्वास लेने के कारण जिनके फण चंचल हो रहे थे ...
उन सर्पों ने परस्पर मिलकर दैत्यराज हिरण्यकशिपु को सूचित किया कि – प्रभो ! हम पर्वतों को भी भस्म करने में समर्थ हैं । यदि उन पर हमारी शक्ति न चले तो आप तत्काल हमारा वध कर सकते हैं । परन्तु आपके पुत्र महानुभाव प्रह्लाद के वध में लगने के कारण हम दांतों से भी हीन हो गये । इस प्रकार बड़ी कठिनाई से निवेदन करके अपने कार्य में असफल हुए अत्यन्त आश्चर्य के साथ प्रह्लाद के अद्भुत सामर्थ्य का विचार करते हुए चले गये ।
एक समय दैत्यपति हिरण्यकशिपु ने दैत्यों को बुला कर कहा कि रात्रि में सोते हुए प्रह्लाद को नागपाशों में बांध कर समुद्र के मध्य पटक दो । उस समय राक्षस भी राजा की आज्ञा को शिरोधार्य करके रात्रि में समाधि के कारण सुषुप्त की तरह स्थित रागद्वेष बन्धनों से रहित महात्मा प्रह्लाद को तुच्छ सर्प रूपी रस्सी से राक्षसों ने बांध दिया और उस को समुद्र में पटक कर ऊपर से पर्वतों को उसके ऊपर डाल कर राक्षसों ने दैत्यराज हिरण्यकशिपु को यह प्रिय समाचार सुना दिया ।
समुद्र में पड़े हुए प्रह्लाद को भगवान् के तेज से दूसरे वाडवाग्नि की तरह प्रज्वलित देख कर अत्यन्त भय के कारण ग्राहों ने उसे दूर से ही त्याग दिया । प्रह्लाद भी अपने से अभिन्न चिदानन्दमय समुद्र में समाहित होने के कारण यह नहीं जान सके कि मुझे बांध कर खारे पानी के समुद्र में डाल दिया गया है । जब ब्रह्मानन्दामृत निधि प्रह्लाद अपनी आत्मा में स्थित हो गये उस समय समुद्र इस प्रकार क्षुब्ध हो गया कि – जैसे उसमें दूसरे महासागर का प्रवेश हो गया हो ।
समुद्र की लहरें प्रह्लाद को धीरे धीरे कठिनाई से ठेल कर नौका रहित सागर के किनारे पर ले गयीं, जैसे ज्ञानी गुरु के वचन क्लेशों को नष्ट कर के भव-सागर से पार पहुंचा देते हैं । ध्यान के द्वारा विष्णु-स्वरूप हुए प्रह्लादजी को किनारे पर पहुंचा कर वरुणालय भगवान् बहुत से रत्नों को लेकर उनके दर्शनों के लिए पधारे । इतने में भगवान् की आज्ञा से गरुड़ वहां आ गये और बन्धनभूत सर्पों को खाकर चले गये । अतः साधक को चाहिये कि दृढ़ निश्चय के साथ भगवान् की भक्ति करे ।
(क्रमशः)
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