शुक्रवार, 7 मई 2021

*१५. माया कौ अंग ~ १६४/१६८*

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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
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*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१५. माया कौ अंग ~ १६४/१६८*
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बाजीगर बाजी रची, अलिफ़ इलम ओंकार ।
कहि जगजीवन अगम हरि, उतपति मारै मार ॥१६५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि परमात्मा ने ओंकार व आलिफ दोनों को समानार्थी जान कर ही इनकी रचना की । संत कहते हैं कि परमात्मा पहुंच से परे है । वह जनम भी देता है व मारता भी है ।
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कहि जगजीवन रांमजी, निंद्रा नाटिक नेह ।
आवै भावै बिलावै, जागिरत सहज सनेह ॥१६६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि हे जीव संसार में आकर निद्रा या अज्ञान से जरा भी लगाव न रख जैसे इसका आभास हो वैसे ही दूर करें । और जागृति जो कि ज्ञान का प्रतीक है, से स्नेह रखें ।
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कहि जगजीवन ते दुखी, जे देखत गये विलाइ ।
रांम बिमुख जुग जुग दुखी, चित चंचल मंहि चाहि ॥१६७॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस संसार में वे ही दुखी हैं जो देखते देखते ही संसार से चले गये, और कुछ भी सुकृत नहीं कर पाये, राम से विमुख जीव अपने चंचल चित के कारण युग युग दुखी रहते हैं ।
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चित चंचल मंहि चाह१ रहे, क्यूं हरि परसै ताहि ।
कहि जगजीवन प्रेम रस, रांम बिना को पाइ ॥१६८॥
(१. चाह=विविध वासना)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि इस चंचल चित में सदैव कुछ पाने की चाह बनी रहती है अतः बिना समर्पण के प्रभु मिलते नहीं हैं । संत कहते हैं प्रेम रुपी रस के बिना ईश्वर को कौन पा सकता है ।
(क्रमशः)

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