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*सेवक की रक्षा करै, सेवक की प्रतिपाल ।*
*सेवग की वाहर चढै, दादू दीन दयाल ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ बिनती का अंग)*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु ---दया
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तपस्या के समय श्रीपार्वतीजी आश्रम के निकट शिला पर बैठी थी । उन्हें एक आर्त्त बालक की - मुझे ग्राह(मगरमच्छ) से बचाओ इत्यादि आवाज सुनाई दी । वे तत्काल दौड़कर सरोवर गई और देखा कि एक बड़े सुन्दर बालक को ग्राह पकड़कर सरोवर के बीच ले जा रहा है ।
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पार्वतीजी बोली - ग्राहराज ! बालक को छोड़ दो ।
ग्राह - मैं भूखा हूँ नही छोड़ सकता ।
पार्वती - ग्राहराज, मैं तुम्हे प्रणाम करती हूँ, मेरे हिमालय पर किये तप के बल से इसे छोड़ दो ।
ग्राह - तुम अपना तप मुझे अर्पण कर दो तो छोड़ दूंगा ।
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पार्वती - ग्राहराज ! इस तप की बात ही क्या है ? मैंने जन्म भर में जो पुण्य संचय किया है, वह सब तुम्हें अर्पण करती हूँ इस बालक को छोड़ दो ।
ग्राह - तुमने जिस उद्देश्य से तप से तप किया था उसे पूरा न करके इस बालक की रक्षा के लिये देती हो, इस तुम्हारी दयालुता से मैं सन्तुष्ट हुआ हूँ । तुम अपनी तपस्या तथा बालक दोनों को ही रखो ।
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पार्वती - बालक को छुड़ाना मेरा कर्तव्य था तप तो फिर भी हो जायेगा । दिया हुआ तप मैं वापस नही लूंगी । बालक को छोड़ दो ।
ग्राह बालक को छोड़ अन्तर्धान हो गया । पार्वती ने फिर तप करने का विचार किया, तब श्री शंकरजी ने प्रकट होकर कहा - तुम्हें पुन: तप करने की आवश्यकता नहीं रही है, तप तुमने मुझे ही दिया है । मैं ही बालक तथा ग्राह था । दान देने से तुम्हारी तपस्या हजार गुनी होकर अक्षय हो गई है ।
पर रक्षा हित दयालू, निज तप दे तत्काल ।
पार्वती ने ग्राह को, दे रु बचाया बाल ॥१३७॥
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