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*वाहला मारा हृदया भीतर केम न आवै,*
*मने चरण विलम्ब न दीजे रे ।*
*दादू तो अपराधी तारो, नाथ उधारी लीजे रे ॥*
(#श्रीदादूवाणी ~ पद्यांश. १२८)
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक किसी निमित्त से स्वामी से दूर जाता है तो स्वामी उसके पास जाते हैं ॥*
पद सेवक कोउ निमित्त से, यदपि दूर होजाय ।
तो स्वामी करके कृपा, तिहिं समीप में आय ॥११९॥
दृष्टांत कथा – १.विष्वक्सेन, २.सुसेन, ३.बल, ४.प्रबल, ५.जय, ६.विजय, ७.भद्र, ८.सुभद्र, ९.नन्द, १०.सुनन्द, ११.चंड, १२.प्रचण्ड, १३.कुमुद, १४.कुमुदाक्ष, १५.शील, १६.सुशील ।
ये सोलह पार्षद भगवान् के समीप रहकर उनकी चरण सेवा करते हैं । सनकादिक के शाप से जय विजय को दूर जाना पड़ा था तब भगवान् को भी अवतार लेकर उनके पास जाना पड़ा था । यह प्रसिद्ध है । इससे सूचित होता है कि पद सेवक भक्त यदि किसी निमित्त से भगवान् के चरण कमलों से दूर हो भी जाय तो भगवान् उसके पास ही पहुँच जाते हैं ।
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