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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
*दादू ओंकार तैं ऊपजै, अरस परस संजोग ।*
*अंकुर बीज द्वै पाप पुण्य, इहि विधि जोग रु भोग ॥*
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*प्रवृत्ति निवृत्ति का अंग १६०*
इस अंग में प्रवृत्ति निवृत्ति संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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रज्जब वसुधा१ व्योम२ बिच, बीज वृक्ष विस्तार ।
त्यों प्रवृत्ति निवृत्ति मध्य, आतम वो३ ओंकार ॥१॥
पृथ्वी१ और आकाश२ के मध्य जैसे बीज और वृक्ष का विस्तार है । वैसे ही प्रवृत्ति और निवृत्ति में आत्मा और३ ओंकार का विस्तार है ।
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कौण दशा१ फूलै फलै, कौण दशा निरधार२ ।
रज्जब जन३ कण४ गाहकों, किहिं दिशि करै विहार ॥२॥
कौन सी अवस्था१ फूलती फलती है ? प्रवृत्ति की अवस्था फूलती फलती है । कौन सी अवस्था निराधार२ है ? निवृत्ति की अवस्था निराधार है । संतान३ और अन्न४ कण ग्राहक कौन सी दिशा में विचरते हैं ? प्रवृत्ति दिशा की ओर ही विचरते हैं ।
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एक वृक्ष ऊपरि फलै, एक फलै धर१ मांहिं ।
एक दुहूं२ दिशि सुफल है, एक उभय दिशि नांहिं ॥३॥
एक प्रकार के वृक्ष ऐसे होते हैं । जो उपरी शाखा में फल प्राप्त करते हैं । जैसे आम आदि । वैसे ही निवृत्ति प्रधान व्यक्ति संसार दशा से उपर जाकर भी ब्रह्मज्ञान रूप फल प्राप्त करते हैं । एक प्रकार के वृक्ष ऐसे होते हैं जो पृथ्वी१ में फल प्राप्त करते हैं । जैसे आलू आदि । वैसे ही प्रवृत्ति परायण व्यक्ति माया में रहकर मायिक फल ही प्राप्त करते हैं । वैसे ही एक प्रकार के वृक्ष ऐसे होते हैं, जो दोनों२ ओर फल प्राप्त करते हैं, नीचे कंद भी प्राप्त करते हैं और ऊपर फल भी प्राप्त करते हैं, जैसे मूली आदि, वैसे ही प्रवृत्ति निवृत्ति दोनों में शास्त्र के कथनानुसार चलते हैं वे मायिक सुख तथा ब्रह्मानन्द दोनों ही फलों को प्राप्त करते हैं । एक प्रकार के वृक्ष ऐसे होते हैं जो ऊपर व नीचे दोनों ओर ही फल प्राप्त नहीं करते । जैसे वैत आदि । वैसे ही आलसी पुरुष न मायिक सुख प्राप्त कर सकते हैं और न ब्रह्मानन्द ।
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सत१ जत२ शोधी३ साधु मत४, चतुर५ दशा चहुं आँखि ।
रज्जब सुफल सु लीजिये, निष्फल निरख सु नांखि ॥४॥
संतों के सिद्धान्तों४ को खोज३ करके अर्थात विचार करके गृहस्थी१ और साधु२ वा ब्रह्मचर्य२ पूर्वक सत्य१ स्वरूप ब्रह्म का चिंतन करते हुये, उक्त तीन की साखी में कही हुई १प्रवृत्ति, २निवृत्ति, ३प्रवृत्ति निवृत्ति, ४प्रवृत्ति-निवृत्ति से ही हीन, इन चारों५ अवस्थाओं को वो भीतर के विवेक, विचार, दो बाहर के इन चारों नेत्रों से देखकर सुन्दर फल प्रदान करने वाली को ग्रहण करो और निष्फल को त्यागो, यही प्रवृत्ति निवृत्ति संबंधी श्रेष्ठ परामर्श है ।
(क्रमशः)

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