बुधवार, 8 सितंबर 2021

*(२)समाधि में श्रीरामकृष्ण*

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*दादू हम दुखिया दीदार के, तूं दिल थैं दूरि न होइ ।*
*भावै हमको जाल दे, होना है सो होइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(२)समाधि में श्रीरामकृष्ण*
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हाजरा आकर बैठे । दो-एक बातें इधर-उधर की करके श्रीरामकृष्ण ने कहा - “देखो, कल राम के यहाँ उतने आदमी बैठे हुए थे, विजय, केदार, आदि फिर भी नरेन्द्र को देखकर मुझे इतना उद्दीपन क्यों हुआ ? केदार, मैंने देखा, कारणानन्द के घर का है ।"
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श्रीरामकृष्ण महाष्टमी के दिन कलकत्ता गये हुए थे - देवी प्रतिमा के दर्शनों के लिए । अधर के यहाँ प्रतिमा-दर्शन करने के लिए जाने से पहले राम के यहाँ गये थे । वहाँ बहुत से भक्त आये थे । नरेन्द्र को देखकर श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये थे । नरेन्द्र के घुटने पर उन्होंने अपना पैर रख दिया था और खड़े हुए समाधि-मग्न हो गये थे ।
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देखते ही देखते नरेन्द्र भी आ गये । उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण के आनन्द की सीमा नहीं रही । श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करने के पश्चात् भवनाथ आदि के साथ उसी कमरे में नरेन्द्र बातचीत करने लगे । पास मास्टर हैं । कमरे में लम्बी चटाई बिछी हुई है । नरेन्द्र बातचीत करते हुए पेट के बल चटाई पर लेट गये । उन्हें देखते ही देखते श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये । वे नरेन्द्र की पीठ पर जा बैठे, वहीं समाधि में डूब गये ।
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भवनाथ गा रहे हैं - (भाव) –
“माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना । तेरे कमलचरणों को छोड़ मेरा मन और कुछ नहीं चाहता । यह मुझे दोषदुष्ट बतलाता है, परन्तु मेरी समझ में नहीं आता कि मेरा दोष क्या है । तू मुझे बतला दे । माँ, मेरी तो यह इच्छा थी कि भवानी का नाम लेकर मैं भव-सागर से पार हो जाऊँ । मैं स्वप्न में भी नहीं जानता था कि अछोर समुद्र में मुझे इस तरह डूबना होगा । दिन-रात मैं दुर्गानाम की रट लगाये रहता हूँ, फिर भी मेरी दुःख राशि दूर नहीं होती है । हर-सुन्दरी, अबकी बार अगर मैं मरा, तो तेरा दुर्गा नाम और कोई न लेगा ।"
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श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी । उन्होंने दो गाने गाये । एक का भाव यह है –
“श्रीदुर्गा नाम का जप करो, ऐ मेरे मन ! ..... माँ ! दुखी दास पर दया करो, तो तुम्हारा गुण भी मेरी समझ में आये । माँ, तुम सन्ध्या हो, तुम दीपक हो, तुम्हीं यामिनी हो । कभी तो तुम पुरुष होती हो और कभी स्त्री । माँ, रामरूप में तो तुम धनुर्धारण करती हो और कृष्ण रूप में तुम वंशी हाथ में लेती हो । माँ, मुक्त-कुन्तला होकर तुमने शिव को मुग्ध कर लिया था । तुम्ही दस महाविद्याएँ हो और तुम्हीं दस अवतार ।
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अबकी बार किसी तरह, माँ, मुझे पार करो । माँ, जवापुष्यों और बिल्वदलों से यशोदा ने तुम्हारी पूजा की थी । तुमने कृष्ण को उनकी गोद में डालकर उनकी मनोकामना पूरी की । माँ, जहाँ-तहाँ पड़ा रहा करता हूँ; कभी तो जंगल में ही पड़ा रहता हूँ, परन्तु मेरा मन तेरे श्रीचरणों में ही लगा रहता है । माँ, मैं जहाँ-तहाँ दुर्भाग्य के फेर में पड़ा अपने भाग्य पर रोया करता हूँ ।
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खैर, मुझे इसका भी दुःख नहीं प्रार्थना है कि अन्त समय में जिह्वा तेरे नाम का उच्चारण करे । अगर तू मुझे किसी दूसरी जगह चले जाने के लिए कहे, तो माँ, इतना तो बतला, मैं किसके पास जाऊँ ? माँ, दूसरी जगह यह सुधा-मधुर तेरा नाम मुझे कहाँ मिल सकता है ? तू चाहे कितना ही ‘छोड़ छोड़' क्यों न करे, परन्तु मैं तुझे न छोडूँगा । मैं नुपुर बनकर तेरे श्रीचरणों में बजता रहूँगा । माँ, जब तू शिव के निकट बैठेगी तब तेरे चरणों में मैं 'जय शिव जय शिव' कहकर बजता रहूँगा ।"
(क्रमशः)

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