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*सेवक बिसरै आप कौं, सेवा बिसरि न जाइ ।*
*दादू पूछै राम कौं, सो तत्त कहि समझाइ ॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक को ध्यान में बाह्य ज्ञान नहीं रहता ॥*
पद सेवक को ध्यान में, रहे न बाह्य ज्ञान ।
आशकरण पद छिदे पर, हुआ नहीं कुछ भान ॥१२६॥
दृष्टांत कथा – नरवरगढ़ के राजा भीमसिंह के पुत्र और कील्ह स्वामी के शिष्य राजा आशकरण भगवान् के पद सेवक भक्त थे । दश घड़ी दिन चढ़े तक भगवत् सेवा में रहते थे । द्वारपालों को आज्ञा थी कि भगवत् सेवा के समय कोई भी मेरे सामने न आने पावे तथा न कोई सन्देश ही दिया जाय ।
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एक दिन बादशाह की सवारी निकालने वाली थी । किसी कार्य के लिये बादशाह ने प्रात: ही आशकरनजी को बुलवाया किन्तु राजा के द्वारपालों ने न तो सिपाहियों तथा न दुबारा गये हुये सेना सहित सेनापति को भी राजा के पास तक जाने दिया । सेनापति ने यह सब बादशाह को लिख भेज कर युद्ध की आज्ञा माँगी । तब बादशाह स्वयं ही गया ।
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द्वारपालों ने केवल बादशाह को ही राजा के पास जाने दिया । बादशाह ने जाकर देखा, राजा सेवा पूजा करके भगवान् को दण्डवत कर रहे थे । देर तक खड़े रहने पर भी राजा ने जब बादशाह की ओर नहीं देखा तब बादशाह ने राजा के पैर पर तलवार मारी जिससे राजा की एडी कट गयी तब भी राजा को कुछ भी भान(ज्ञान) नहीं हुआ ।
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राजा दण्डवत करके जब बाहर आये तो बादशाह को खड़े देखा और मर्यादा के साथ बादशाह से मिले । राजा की भक्ति से बादशाह बहुत प्रसन्न हुये और क्षमा भी माँगी । इससे सूचित होता है कि पदसेवक भक्त को प्रभु पाद पद्म के ध्यान के समय वाह्य ज्ञान नहीं रहता ।

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