🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१८. साध को अंग ~ १२१/१२४*
.
जगजीवन बैकुंठ है, अरध१० उरध११ मधि१२ बास ।
भगत मंडली रांमजी, बारह मास निवास ॥१२१॥
(१०. अधर=अधः, हीन उपासना) {११. उरध=ऊर्ध्व(उत्तम) उपासना}
(१२. मधि=मध्यम उपासना)
संतजगजीवन जी कहते है कि भली भांति की गयी उपासना या पूजा ही बैकुंठ का मार्ग प्रशस्त कर वहां तक ले जाती है जहाँ जीवात्मा भक्त मण्डली के साथ बारह मास या नित्य ही सुखपूर्वक निवास करते हैं ।
.
जगजीवन बैकुंठ है, जहां बरषै अम्रित नूर ।
भीजै आतम प्रांण मन, सकल बस्त भरपूर ॥१२२॥
संतजगजीवन जी कहते हैं वहाँ ही बैकुंठ है जहाँ संतो की वाणी से वचनामृत बरसता है । जिससे तन मन आत्म सब आर्द्र रहते हैं । और सभी वांछित भरपूर मिलता है ।
.
जगजीवन बैकुंठ है, कोटि भांति के आंन ।
जन के हरिगुण रांमजी, बिरह प्रेम गुर ज्ञांन ॥१२३॥
संतजगजीवन जी कहते है कि करोड़ों भांति के अन्य भी बैकुंठ है जो भांति भांति से सुख देते हैं और जीवात्मा उनको उस सुख के कारण ही बैकुंठ मानते हैं । किन्तु भक्त जन के तो हरिगुणगान ही है जिसमें गुरु ज्ञान से प्रेम के कारण विरह है ।
.
कहि जगजीवन रांमजी, रांमति बूझै रांम१ ।
केइ जन संगति सो लहै, जे निति सुमिरै रांम ॥१२४॥
(१. संगति बूझै रांम=जहाँ तहाँ सन्तों के पास जाकर राम के विषय में पूछते हैं)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जिज्ञासु जन जहाँ तहाँ संतों के सानिध्य में जाकर प्रभु विषयक बात पूछते हैं और जो सदा संगति में रहते हैं वे नित्य सिमरण करते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें