बुधवार, 1 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.९५

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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.९५)*
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*९५. वस्तु निर्देश । चौताल*
*निर्मल तत्त निर्मल तत्त निर्मल तत्त ऐसा ।*
*निर्गुण निज निधि निरंजन, जैसा है तैसा ॥टेक॥*
*उतपत्ति आकार नांही, जीव नांही काया ।*
*काल नांही कर्म नांही, रहिता राम राया ॥१॥*
*शीत नांही घाम नांही, धूप नांही छाया ।*
*बाव नांही वर्ण नांही, मोह नांही माया ॥२॥*
*धरणी आकाश अगम, चंद सूर नांही ।*
*रजनी निशि दिवस नांही, पवना नहीं जांही ॥३॥*
*कृत्रिम घट कला नांही, सकल रहित सोई ।*
*दादू निज अगम निगम, दूजा नहीं कोई ॥४॥*
*इति राग माली गौड़ समाप्त ॥२॥पद २६॥*
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भा० दी०–तद् ब्रह्मतत्त्वमतिनिर्मलम् - समस्तदोषरहितम् । तदीयं नैर्मल्यं मुखेन कोऽपि वक्तुं न शक्नोति । निर्गुणम्-गुणातीतम् ।सत्पुरुषाणान्तु सर्वस्वधनम् । निरञ्जनम् = मायातीतम् । शाश्वतम् = अपरिवर्तनीयम् । ईदृशमेव ब्रह्मेति न कोऽपि वक्तुं पारयति, यतस्तस्य सर्वरूपत्वात् । न च तदुत्पद्यतेऽनादित्वात् । “न जायते प्रियते” इति श्रुतेश्च । न च तस्याकारविशेषं विभाति । सर्वाकार- त्वात् । न च तस्य प्राणा: प्रतीयन्ते । सर्वप्राणाधिष्ठातृत्वात् । नच शरीरं निरवयत्वात् । स परमात्मा विश्वराड् कालकर्मादिरहितत्वात् । अशरीरं शरीरेस्वनवस्थेष्ववस्थितम् । इतिश्रुतेः । नच तस्मिन् शीतोष्णच्छायातपाः प्रभवन्ति । अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ॥इति श्रुतेः । पृथिव्यादिपञ्चभूतरहितम् । इन्द्रियातीतत्वेनागम्यं तद् ब्रह्म । नच सूर्यचन्द्रविद्युतादि प्रकाशभास्यम् । न तत्र सूर्योभाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । इति श्रुतेः ।तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासासर्वमिदं विभाति । इति श्रुतेः । मायाकृतप्रपञ्चनिर्मुक्तम् । कलातीतं सर्वधर्मातीतं निजानन्दस्वरूपं ब्रह्मैव सत्यम् । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मेति श्रुतेः ।
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वह ब्रह्म माया कृत दोषों से रहित होने के कारण निर्मल है । उसकी निर्मलता का मुख से कोई वर्णन नहीं कर सकता । सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों से रहित होने से वह निर्गुण कहलाता है । सत्पुरुषों का तो वह परम धन है । माया रहित होने से निरन्जन कहलाता है । अपरिवर्तनीय होने से शाश्वत है ।
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ब्रह्म सर्वरूप है, अतः उसका कोई एकरूप नहीं होने से कोई भी ‘ऐसा ब्रह्म है’ नहीं कह सकता । अनादि होने से उत्पत्ति-नाश से रहित है । सर्वरूप होने से उसका कोई आकार विशेष नहीं कह सकते, न उसका प्राण और शरीर है, क्योंकि वेद में ऐसा ही कहा है कि वह स्थिर न रहने वाले प्राणियों के शरीर में शरीर-रहित होता हुआ अविचल भाव से स्थित है ।
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वह विश्व का राजा काल-कर्मादिधर्मों से रहित है । उसको शीत, उष्ण, धूप, छाया, आदि कोई भी नहीं छू सकते । श्रुति में ऐसा ही कहा है कि वह शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इन सबसे रहित नित्य अव्यय रूप है । पृथिव्यादि पंच भूतों से रहित तथा इन्द्रियों से अगम्य है क्योंकि श्रुति ऐसा ही प्रतिपादन करती है ।
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वह सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि प्रकाशों से प्रकाशित नहीं होता किन्तु ये सब सूर्य, चन्द्रादि उसी के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, फिर ये लौकिक अग्नि उसको कैसे प्रकाशित कर सकती है ? संपूर्ण विश्व को प्रकाशित करने वाला ब्रह्म ही है । श्रुति में कहा है कि – वह ब्रह्म परमेश्वर मन, वाणी, नेत्रों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है, फिर भी वह अवश्य है ।
(क्रमशः)

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