बुधवार, 8 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०१

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०१)*
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*१०१. (सिंधी) । पंचम ताल*
*आ वे सजणां आव, शिर पर धर पाँव ।*
*जानी मैंडा जिन्द असाडे,*
*तूँ रावैंदा राव वे, सजणां आव ॥टेक॥*
*इत्थां उत्थां जित्थां कित्थां, हूँ जीवां तो नाल वे ।*
*मीयां मैंडा आव असाडे,*
*तूँ लालों सिर लाल वे, सजणां आव ॥१॥*
*तन भी डेवाँ, मन भी डेवाँ, डेवाँ पिंड पराण वे ।*
*सच्चा सांई मिल इत्थांईं,*
*जिन्द करां कुरबाण वे, सजणां आव ॥२॥*
*तूँ पाकों शिर पाक वे, सजणां, तूँ खूबों शिर खूब ।*
*दादू भावे सजणां आवे,*
*तूँ मिट्ठा महबूब वे, सजणां आव ॥३॥*
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भा० दी०-हे सज्जन ! आगच्छ आगच्छ । कृपापदं मे शिरसि निधेहि । त्वमेव मे वास्तविक मित्रम् । त्वां प्रति स्पृहात्मनां त्वमेव जीवितम् । राजराजेश्वरोऽसि । इह लोके परलोके वा यत्र कुत्राऽपि वा निवसामस्तत्र त्वया साकमेव जिजीविषाम: । हे स्वामिन् ! आगम्यतां स्वागतं ते । त्वमेव मे प्रियादपि प्रियतरोऽसि । शरीरं मन: प्राणष्ठ, यत्किमपि तत्सर्वं तुभ्यं समर्पयामि । पावनानामपि पावनतमस्त्वमेव मे प्रियोऽसि । अतिमधुरं प्रेमपात्रं त्वमेवासि । अतो हे सज्जन ! अवश्यं पदार्पण निधेहि तेनाहं कृतकृत्यो भवामि ।
दीनबन्धावष्टके-
गायन्ति सामकुशला यमजं मखेषु,ध्यायन्ति धीरमतयो यतयो विविक्ते ।
पश्यन्ति योगिपुरुषाः पुरुषं शरीरे, दृग्गोचरो भवतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥
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हे सज्जन ! आइये, पधारिये, अपने कृपा रूपी चरण-कमलों को मेरे शिर-राखिये । आप ही हमारे सच्चे मित्र हैं । आप में ही जिनका अन्तःकरण लगा हुआ है, उन भक्तों के तो आप ही जीवन हैं । आप राजाओं के भी राजा हैं । इस लोक तथा परलोक में जहां कहीं भी हम निवास करें, वहां पर आपके साथ ही रहते हुए हम जीने की इच्छा रखते हैं ।
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हे स्वामिन् ! आइये, आपका स्वागत है । आप ही मेरे प्रिय से भी प्रियतम हैं । शरीर, इन्द्रियाँ, मन, प्राण, ये सब आपके चरणों में समर्पित हैं । अधिक क्या कहूं, मैंने अपना जीवन भी आपको दे दिया है । आप पवित्रों को भी पवित्र करने वालों में मेरे प्यारे हैं । मधुर से मधुर प्रेम पात्र हैं इसलिये हे सज्जन ! अवश्य पधारिये, जिससे मैं कृतकृत्य हो जाऊं ।
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दीनबन्धुअष्टक – यज्ञ में सामवेद के गाने वाले, अजन्मा आपके ही गुण गाते हैं । बुद्धिमान् संन्यासी एकान्त में जिनका ध्यान करते हैं और योगीजन अपने शरीर के भीतर पुरुष रूप में जिनका साक्षात्कार करते हैं, वे दीनबन्धु भगवान् आज मेरे नेत्रों के सामने प्रकट हों ।
(क्रमशः)

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