बुधवार, 8 सितंबर 2021

*१८. साध को अंग ~ १४५/१४८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१८. साध को अंग ~ १४५/१४८*
.
कहि जगजीवन देह सब, रांम नांम सों मोहि ।
रांम सरीखा साध सौ, निज अंग मांहै सोइ ॥१४५॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि सारी काया राममय हो ऐसे सिधु स्वयं अपनी देह में ही परमात्मा का स्वरुप है ।
.
कहि जगजीवन साध का, मता५ मांहि अबिगत्त ।
हरि बोलै हरि ही सुणैं, हरि परसै हरि रत्त ॥१४६॥
{५. मता(दृढ निश्चय)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि साधु जन का पक्का निश्चय परमात्मा पर ही होता है वे यह ही बोलते हैं प्रभु नाम ही सुनते हैं व इसी में लीन रहते हैं ।
.
परम पुरिष सों लीन रहै, यहु मन अगम अगाध ।
कहि जगजीवन धर्या६ में, सेवा संगति साध ॥१४७॥
{६. धर्या=भूलोक में(संसार में)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो उस परम पुरुष परमात्मा में लीन रहते हैं और मन में उन अगम अगाध प्रभु का ध्यान करते हैं । इस धरती पर सच्ची सेवा साधु जन ही करते हैं अतः उन्हीं की संगति करणीय है ।
.
रांम नांम निज ले रहै, सतसंगति मैं आइ ।
कहि जगजीवन पूरि हरि, परम पदारथ पाइ ॥१४८॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो सतसगंत में आकर सिमरण कर रहे हैं उन्हीं का जीवन पूर्ण है । और वे ही परम तत्त को पाये हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें