गुरुवार, 16 सितंबर 2021

शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०७

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🦚 *#श्रीदादूवाणी०भावार्थदीपिका* 🦚
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भाष्यकार : ब्रह्मलीन महामण्डलेश्वर स्वामीआत्माराम जी महाराज, व्याकरण वेदांताचार्य, श्रीदादू द्वारा बगड़, झुंझुनूं ।
साभार : महामण्डलेश्वर स्वामीअर्जुनदास जी महाराज, बगड़, झुंझुनूं ।
*#हस्तलिखित०दादूवाणी* सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*(#श्रीदादूवाणी शब्दस्कन्ध ~ पद #.१०७)*
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*१०७. गजताल
*तूँ ही तूँ आधार हमारे,*
*सेवक सुत हम राम तुम्हारे ॥टेक॥*
*माई बाप तूँ साहिब मेरा,*
*भक्ति-हीण मैं सेवक तेरा ॥१॥*
*मात पिता तूँ बान्धव भाई,*
*तुम ही मेरे सजन सहाई ॥२॥*
*तुम हीं तातं तुम ही मातं,*
*तुम ही जातं, तुम्ह ही न्यातं ॥३॥*
*कुल कुटुम्ब तूँ सब परिवारा,*
*दादू का तूँ तारणहारा ॥४॥*
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भा० दी०- त्वमेव मे आश्रयः । अहन्तु भावत्क: सुत: सेवकश्चास्मि । अतस्त्व- याऽनुग्राह्योऽहम् । त्वमेव मे माता पिता स्वामी चासि । अहन्तु सर्वथा भक्तिहीनसेवानुचरोऽस्मि । त्वमेव मे बन्धुर्बान्धवश्चासि । यतो हि त्वमेव मे संसारोद्धारकः । अन्ये तु सर्वे सांसारिका: पदार्था बन्धनकारिणः । त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव वन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
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आप ही मेरे आश्रय हैं । मैं तो आपका पुत्र और सेवक हूं । इसलिये मेरे ऊपर कृपा करो । आप ही मेरे माता, पिता, स्वामी हैं । मैं तो भक्ति-हीन सेवक हूं । आप ही मेरे माता, पिता, भाई, बन्धु, बान्धव और सहायक मित्र हैं क्योंकि आप संसार से उद्धार कर देते हैं । बाकी माता-पिता तो बन्धन डालने वाले हैं । अतः आप मेरे उद्धार कीजिये ।
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लिखा है कि-
हे भगवन् ! आप ही माता, पिता, बन्धु वर्ग और मित्र हैं । आप ही विद्या-धन हैं । हे देव ! देव ! कहां तक कहूं, आप ही मेरे सब कुछ हैं ।
(क्रमशः)

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