🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
https://www.facebook.com/DADUVANI
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१८. साध को अंग ~ १७३/१७६*
.
कहि जगजीवन रांम रत, भगति प्रेम रस पील ।
अगम ठौर तहां गम करै, दया धरम सत सील ॥१७३॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो जीव राम में लीन हैं उनके आधार प्रेम व भक्ति हैं । वे दया धर्म सत्य व शील के कारण जहाँ सहजता से नहीं पहुंच पाते(जहां जहाँ प्रभु हैं) वहां भी पंहुच जाते हैं ।
.
दया धरम तहँ रांमजी, अविगत चीन्है सोइ ।
कहि जगजीवन दया बिन, धरम ध्यांन नहिं होइ ॥१७४॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ दया धर्म है वहां प्रभु स्वरूप दिखता है । जहां दया नहीं है वहां धर्म ध्यान कुछ भी नहीं है ।
.
सिकम१ अनल सब बन दहै, नांम नीर२ भरि राखि ।
कहि जगजीवन क्रिपा हरि, अम्रित सुधा रस चाखि ॥१७५॥
(१. सिकम अनल=अग्नि की एक छोटी सी चिनगारी भी) (२. नांम नीर=भगवन्नाम रूपी जल का संग्रह)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि विषय अग्नि की छोटी सी चिंगारी इस शरीर रुपी वन को भस्म कर सकती है अतः नाम वाला जल भर कर रखिये तो परमात्मा की कृपा से अमृत पान कर पायेंगे ।
.
निज निज निबहैं नाँउ रत, नख सिख बिरह जगाइ ।
कहि जगजीवन नूर मंहि, सब अंग रहै समाइ ॥१७६॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि उस प्रभु के तेज में नख से शिख तक उनका विरह हो तो जीव सम्पूर्ण उसी में समाया रहता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें