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🌷 *#श्रीरामकृष्ण०वचनामृत* 🌷
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*सहकामी सेवा करैं, मागैं मुग्ध गँवार ।*
*दादू ऐसे बहुत हैं, फल के भूँचनहार ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(४)कर्मयोग तथा मनोयोग*
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आज बृहस्पतिवार, २ अक्टूबर, १८८४ - आश्विन शुक्ला द्वादशी-त्रयोदशी । कल श्रीरामकृष्ण कलकत्ते में अधर के यहाँ आये हुए थे । श्रीरामकृष्ण वहाँ कीर्तनानन्द में नाचे थे ।
श्रीरामकृष्ण के पास आजकल लाटू, हरीश और रामलाल रहते हैं । बाबूराम भी कभी कभी आकर रहते हैं । श्रीयुत रामलाल श्रीभवतारिणी की सेवा करते हैं । हाजरा महाशय भी हैं ।
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आज श्रीयुत मणिलाल मल्लिक, प्रिय मुखर्जी, उनके आत्मीय हरि, शिवपुर के एक ब्राह्मभक्त, बड़ाबाजार १२ नम्बर मल्लिक स्ट्रीट के मारवाड़ी भक्त श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए हैं । क्रमशः दक्षिणेश्वर के कई लड़के और सींती के महेन्द्र वैद्य आये । मणिलाल पुराने भक्त हैं ।
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श्रीरामकृष्ण - (मणिलाल आदि से) - नमस्कार मन ही मन का अच्छा होता है । पैरों पर हाथ रखकर नमस्कार की क्या जरूरत है ? और मन ही मन जिसे नमस्कार किया जाता है, उसे सङ्कोच भी नहीं होता ।
"मेरा ही धर्म ठीक है और सब मिथ्या है, यह सब अच्छा नहीं ।
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"मैं देखता हूँ, वे ही सब कुछ हुए हैं - मनुष्य, प्रतिमा, शालग्राम; सब के भीतर एक ही सत्ता देखता हूँ ! मैं एक को छोड़ दूसरा कुछ नहीं देखता ।
"बहुत से लोग सोचते हैं, मेरा ही मत ठीक है और सब गलत है - हम जीते और सब हार गये । इससे, जो, बढ़ गया है, वह थोड़े के लिए अटक जाता है । तब जो पीछे पड़ा था, वह बढ़ जाता है । गोलकधाम के खेल में, बहुत कुछ बढ़ गया, परन्तु फिर पौ न पड़ा ।
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"हार और जीत उनके हाथ में हैं । उनका काम कुछ समझ में नहीं आता । देखो, नारियल इतने ऊँचे रहता है, धूप लगती है, फिर भी उसके जल की तासीर ठण्डी है । इधर पानी-फल(सिंघाड़े) पानी में रहते हैं, परन्तु उनकी तासीर गर्म होती है ।
"आदमी का शरीर देखो । सिर जो मूल है, ऊपर चला गया ।"
मणिलाल - हमारा इस समय कर्तव्य क्या है ?
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श्रीरामकृष्ण - किसी तरह उनके साथ युक्त होकर रहना । दो रास्ते हैं, कर्मयोग और मनोयोग ।
"जो लोग गृहस्थाश्रमी हैं, उनका योग कर्म के द्वारा होता है । चार आश्रम हैं - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास । संन्यासी को काम्य कर्मों का त्याग करना चाहिए, परन्तु नित्यकर्म उसे कामना-हीन होकर करना चाहिए । दण्डधारण, भिक्षा, तीर्थ यात्रा, पूजा, जप, इन सब कर्मों के द्वारा उनके साथ योग होता है ।
"और चाहे जो काम करो, फल की आकांक्षा का त्याग करके, फल की आकांक्षा को छोड़कर कर सको तो उनके साथ योग होगा ।
(क्रमशः)

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