मंगलवार, 21 सितंबर 2021

*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३(१/४)*

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*बातों सब कुछ कीजिये, अंत कछू नहिं देखै ।*
*मनसा वाचा कर्मना, तब लागै लेखै ॥*
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श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*करणी बिना ज्ञान का अंग १६३*
इस अंग में कर्तव्य रहित ज्ञान संबंधी विचार कर रहे हैं ~
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दीपक ज्ञान बताय दे, ज्योति सु कर तन मांहिं ।
रज्जब पकड़ै प्राणि उठि, दीवा पकड़ै नांहि ॥१॥
जैसे दीपक अपनी ज्योति की सुन्दर किरणों द्वारा वस्तु को दिखा देता है किंतु उस वस्तु को प्राणी ही उठकर ग्रहण करता है, दीपक तो नहीं पकड़ता । वैसे ही ज्ञान तो ब्रह्म के स्वरूप को शरीर में बता देता है किंतु निदिध्यासन रूप कर्तव्य करे बिना साधक को ब्रह्मानन्द कब मिलता है ।
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दीपक दोन्यों एकसा, चोर शाह चित नांहिं ।
तैसे रज्जब ज्ञान गति१, मन प्राणी के मांहिं ॥२॥
दीपक चोर और साहुकार दोनों को सम प्रकाश देता हुआ समान रहता है । वैसे ही जिस प्राणी के मन में ज्ञान है, उसकी भी दीपक के समान ही चेष्टा१ होती है । ज्ञानी के चित्त में भी भेद दृष्टि का अभाव और ब्रह्मदर्शन रूप कर्तव्य रहता है ।
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हीरा हरसी१ तिमिर को, पर शीत हर्या नहिं जाय ।
त्यों रज्जब दीपक ज्ञान का, जो देख्या निरताय ॥३॥
हीरा अंधेरे को हर-लेगा१ परन्तु शीत तो उससे नहीं हरा जाता । यदि विचार करके देखा जाय तो वैसा ही ज्ञान दीपक है । ज्ञान, अज्ञान को तो हर लेता है किंतु देह दुखों को तो नहीं हरता, वे तो संयम, उपचार तथा धारण रूप कर्तव्य से दूर किये जाते हैं या सहन किये जाते हैं ।
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रज्जब दीपक ज्ञान का, तिमिर हरै दे नेत१ ।
परि भजन बिना भाजै नहीं, इन्द्री अरि दल खेत ॥४॥
ज्ञान का दीपक विचार रूप नेत्र१ देकर अज्ञानांधार को तो हर लेता है परन्तु भजन रूप कर्तव्य बिना योगरूप युद्ध क्षेत्र से इन्द्रिय और कामादि शत्रु दल नहीं भागता ।
(क्रमशः)

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