मंगलवार, 21 सितंबर 2021

*वेदान्त-विचार*

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*सब तज गुण आकार के, निश्‍चल मन ल्यौ लाइ ।*
*आत्म चेतन प्रेम रस, दादू रहै समाइ ॥*
*(#श्रीदादूवाणी ~ लै का अंग)*
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साभार ~ श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*(६) श्रीरामकृष्ण की बालक जैसी अवस्था । वेदान्त-विचार*
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श्रीरामकृष्ण के पैर फूले हुए हैं । इसके लिए वे एक बालक समान चिन्ता कर रहे हैं ।
सींती के महेन्द्र कविराज आये और उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया ।
श्रीरामकृष्ण - (प्रिय मुखर्जी आदि भक्तों से) - कल नारायण से मैंने कहा, "तू अपने पैर में उँगली गड़ाकर जरा देख तो सही, उँगली का निशान बनता है या नहीं ।' उसने गड़ाकर देखा तो निशान बन गया । तब मेरे जी में जी आया कि मेरे पैरों का फूलना भी कुछ नहीं है । (मुखर्जी से) तुम भी जरा अपने पैर में उसी तरह उँगली गड़ाओं । गड्डा हुआ ?
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मुखर्जी - जी हाँ ।
श्रीरामकृष्ण - अब मेरा जी ठिकाने हुआ ।
मणि मल्लिक - आप बहते हुए पानी में नहाया कीजिये । दवा की क्या जरूरत है ?
श्रीरामकृष्ण - नहीं जी, तुम्हारा अभी खून ताजा है, बात ही कुछ और है ?
"मुझे बच्चे की अवस्था में रखा है ।
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"एक दिन घास के जंगल में मुझे किसी कीड़े ने काट लिया । मैंने सुना था, साँप अगर दो बार काटे तो विष निकाल लेता है । इसी ख्याल से बिलों में हाथ डालता फिरता था । एक ने आकर कहा, 'यह आप क्या कर रहे हैं ? - साँप जब उसी जगह फिर काटता है, तब विष निकाल लेता है । दूसरी जगह काटने से नहीं होता ।'
“मैंने सुना था, शरद् काल की ओस लगाना अच्छा है । उस दिन कलकत्ते से आते हुए गाड़ी में से सिर निकालकर मैंने खूब ओस लगायी । (सब हँसते हैं ।)
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(सींती के महेन्द्र से) "तुम्हारे सींती के वे पण्डितजी अच्छे हैं । वेदान्तवागीश हैं, मुझे मानते हैं । जब मैंने कहा, तुमने तो खूब अध्ययन किया है - परन्तु मैं अमुक पण्डित हूँ', ऐसे अभिमान का त्याग करना, तब उसे बड़ा आनन्द हुआ । "उसके साथ वेदान्त की बातें हुईं ।
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(मास्टर से) “जो शुद्ध आत्मा हैं, वे निर्लिप्त हैं । उनमें माया या अविद्या है । इस माया के भीतर तीन गुण हैं - सत्त्व, रज और तम । जो शुद्ध आत्मा हैं उन्हीं में ये तीनों गुण हैं; किन्तु फिर भी वे निर्लिप्त हैं । आग में अगर आसमानी रंग की बड़ी डाल दो तो उसकी शिखा उसी रंग की दीख पड़ती है । लाल बड़ी छोड़ो तो शिखा भी लाल हो जाती है । परन्तु आग का अपना कोई रंग नहीं है ।
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“पानी में आसमानी रंग डालो तो आसमानी रंग हो जायेगा और फिटकरी छोड़ो तो वही पानी का रंग रहता है ।
"चाण्डाल मांस का भार लिये जा रहा था । उसने आचार्य शंकर को छू लिया । शंकर ने ज्योंही कहा - 'तूने मुझे छू लिया ?' चाण्डाल बोला - 'महाराज, न तुम्हें मैंने छुआ और न मुझे तुमने । तुम तो शुद्ध आत्मा हो - निर्लिप्त हो ।'
"जड़भरत ने भी ऐसी ही बातें राजा रहुगण से कही थीं ।
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"शुद्ध आत्मा निर्लिप्त है और शुद्ध आत्मा को कोई देख नहीं सकता । पानी में नमक घोला हुआ हो तो आँखें नमक को देख नहीं सकतीं ।
"जो शुद्ध आत्मा हैं, वही महाकारण - कारण का कारण हैं । स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण, ये इतने हैं । पाँच भूत स्थूल हैं । मन, बुद्धि और अहंकार सूक्ष्म हैं । प्रकृति अथवा आद्याशक्ति सब की कारणरूपिणी है । ब्रह्म या शुद्ध आत्मा कारण का कारण है ।
"यही शुद्ध आत्मा हमारा स्वरूप है ।
“ज्ञान किसे कहते हैं ? इसी स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना और मन को उसी में लगाये रहना - इस शुद्ध आत्मा को जानना - यही ज्ञान है ।
(क्रमशः)

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