बुधवार, 8 सितंबर 2021

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*साहिब का दर छाड़ि कर, सेवक कहीं न जाय ।*
*दादू बैठा मूल गह, डालों फिरै बलाय ॥६८॥*
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साभार विद्युत् संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
साभार ~ ### स्वामी श्री नारायणदासजी महाराज, पुष्कर, अजमेर ###
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श्री दृष्टान्त सुधा - सिन्धु --- *४ पाद सेवन भक्ति*
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*॥ पद सेवक स्वामी के द्वार को नहीं तजता ॥*
पद सेवक विश्वास कर, बसे स्वामी के द्वार ।
लिया घाटड़े धाम का, नागे ने आधार ॥१२७॥
दृष्टांत कथा – एक वृद्ध दादू पन्थी नागे साधु अन्धे होगये तब सन्तवर दादूजी के शिष्य सुन्दरदासजी की तपो भूमि घाटड़े ग्राम के श्री दादू मन्दिर द्वार के गोखड़े पर जा बैठे और रात दिन 'दादू राम दादूराम' की ध्वनि करते रहते थे । गोखड़े पर बैठे २ नींद ले लेते थे, कारण सोने जितना वह स्थान था ही नहीं । उन्हें कोई वहां सो जाने के लिये कहता था तो वे विश्वास पूर्वक कहते थे कि स्वामी के चरणों को छोड़ कर जीते जी मैं कहीं नहीं जा सकता ।
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वि० सं० १९८६ के लगभग मेरा भी वहां जाना हो गया था । मैंने भी उस सन्त की वह कठोर तपस्या दो मास तक अपने नेत्रों से देखी थी । जीवन पर्यन्त अपना वह व्रत उन्होंने उसी गोखड़े पर निवाहाया था । इससे सूचित होता है कि पद सेवक भक्त विश्वास पूर्वक स्वामी के द्वार पर ही रहता है ।

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